“नव्या”- एक खत तुम्हारे नाम Part 2— मनोगुरू

हाँ… तो बात कहाँ तक पहुँची थी, अरे याद आया ।

जन्मदिन तुम्हारा हो या फिर मेरा मगर एक दूसरे को सबसे पहले बधाई देने की होड़ सी लगती थी और हर बार शायद तुम ही जीती उस फर्ज को ।

खैर याद है ना तुम्हें काफी जिद करती थी तुम मुझसे बस एक गाना सुनने को कि-“बस एक बार सुना दो ना” दो आjतक मैंने सुनाया ही नहीं

पर अब कभी-कभी जब तन्हाई कचोटती है तो गुनगुना लेता हूँ दबी आवाज में ही। पर तुम्हें यह सोचकर ना सुनाया कभी कि कहीं तुम्हारी ये जिद कहीं बढ़ ना जाए ।

याद है ना वो गंगा किनारे बैठकर उस रोज काफी नम सी हो गई थी तुम कि कहीं में दूर ना चला जाऊँ , पर मैं भी कम्बख्त पल भर में तुम्हारे मायूस चेहरे पर मुस्कान को आराम से ला दिया करता था ।

कितने यादगार थे वो दिन औ रात भी जो धीरे-धीरे दिल में आशियाना बनाते जा रहे थे । जिसकी नींव हमारे प्यार व विश्वास की बनी हुई, छत लम्हों और बातों पर टिकी थी । कहते हैं ना कि वक्त कब करवट ले जाए कहा नहीं जा सकता , शायद कुछ ऐसा ही हुआ भी कि यादों की ओट संग करवट ले भी ली तब पता नहीं चला

पर अब मानो एक-एक पल का बखूबी दर्द भरा अहसास सा होता है। जिम्मेदार खुद को कहूँ या किस्मत को समझ नहीं आ रहा था बस तुम्हें कोसने का मन वाकई कभी नहीं किया – “बे-पनाह आशिकी जो सवार थी” ।

संयोग ऐसा बन रहा था जो उसी प्यार व विश्वास वाली नींव को तोड़ता हुआ वियोग की वजह बनता जा रहा था । कभी कभार सोचता भी था कि शायद सब पहले जैसा हो भी जाएगा मगर जिंदगी हर वक्त नए पैंतरे जो दिखाती है ।

काफी कुछ है बयान करने को शायद शब्द कम औ स्याही सूख भी जाए पर मेरा शरीर का रोम रोम तुम्हारे इश्क में भींग सा चुका था शायद अन्दर तक बस गया था पर ……..

part 1 and 2 is given below

“नव्या”- एक खत तुम्हारे नाम part 1

“नव्या” – एक खत तुम्हारे नाम end

Manoguru

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11 thoughts on ““नव्या”- एक खत तुम्हारे नाम Part 2— मनोगुरू

  1. मानो कि देवदास दोबारा देखा हो कुछ ऐसा अहसास हुआ , शायद खुद को ही पढ़ रहा था । शब्द नही है कि कितनी और कैसे तारीफ करू आपकी लेखन शैली की। आपका भविस्य बेहतर होगा।

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