“भटका राहगीर”

दुख किसे कहते है हव्वा के बेटे
जो तुम जान जाते तो
कभी दुख न मनाते
क्या है दुख
लकड़ी के कुंदे से पूछो
जिस पर घिघ्गी बंधे बेजुबानों की मुंडियां रख
उड़ा दी जाती है
लोहे के तेज धार छुरे से पूछो
जो खून के आंसू रोता है
जब जब गिराया जाता है
डर से थरथराती गर्दनों पर
दुख उन दीवारों से पूछो
जो झेलती है मरती चीखों को
सांस रोक सुनती है
मौत की हर दस्तक को
ये कुंदा.. छुरा ..चाकू.. दीवारें
चाह के भी मुक्त नहीँ हो सकते
उस दुख से
उनके पास पाँव नही भाग जाने को
हाथ नहीँ जो रोक सके कसाई को
पर तुम महान हो
क्योंकि तुम इंसान हों
भुजा है पांव है
तो क्यों न खुशी की अजान हो….

भटका राहगीर

 

तु अपनी नब्ज़ की चाल गिन के बता…
तुझे भी मेरी तरह प्यार है के नही…

भटका राहगीर

 

कल रात मैंने अपने सारे ग़म,
कमरे की दीवारों पर लिख डाले,
बस फिर
हम सोते रहे रातभर…
दीवारें रोती रही रातभर…

भटका राहगीर

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Manoguru

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2 thoughts on ““भटका राहगीर”

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