“शेर-ए-बेरुखी” – मनोगुरू

“खुदाई”

खुद को खुदा समझा इस कदर,
खुद-ब-खुद गुनाह कर बैठे…

खुद से ही खफा ‘वो’ अब ऐसे,
खुदगर्ज को वफा जो समझ बैठे…

रोते अब यूँ वो ख्वाबों में भी,
ख्वाबों में खता जो कर बैठे…

खुद को ही जुदा जो कर बैठे,
क्यूँ खुद को “खुदा” समझ बैठे..?

– मनोगुरू

“शेर-ए-बेरुखी”

“वो” उनकी आशिकी में इस कदर मशहूर थे बेशक,
मगर उस बेरुखी को अब तलक भूले नहीं शायद….

-मनोगुरू

तुम्हें दिल में दे पनाह , क्या खूब गुनाह किया..

एक नजर भर सूरत की , मैंने चाहा….
गर सीरत देख चुका होता , ना पछताता…..

– मनोगुरू

कल हसरत थी जिसे पाने की
क्यूँ नफरत है अब , वो नजर आने पर ..

-मनोगुरू

खुद इश्क में खुशी खो,
यूँ बखूबी कोसते किसको….?

-मनोगुरू

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