सुनो बे-जुबान बोलती जो — मनोगुरू

सुनो ! “शायरी”भी बोलती है…

हस्ती है ‘वो’ ऐसी , खुद को ही कोसती जो

बन शायरी मैं ‘उसकी’ ,हर दर्द सोखती जो

हाँ मैं शायरी हूँ ऐसी , हर राज खोलती जो

जहाँ एक ओर दुनिया,बस पीर फेंकती हो

जो साबुत है सुकून से ,वही वीर देखती जो

एहसास करो तुम भी , बे-जुबान बोलती जो

माना सुना ना तुमने,कोई शायरी बोलती हो

मैं शायर ‘मनोगुरू’की,शायरी हूँ बोलती जो…..

↑अभिषेक ‘मनोगुरू’

यूँ देखकर उस रोज , तुम क्यूँ शरमाई थीं
नजरों में सादगी , रख तुम मुस्कुराई थीं

वो तब और आज भी , मैंने जुल्फें जो हटाई थीं
दबी सी आवाज में , कुछ नज्में भी गुनगुनाई थीं

तुम तब और आज भी , शरमाई फिर मुस्कुराई थीं
कैसे पाऊँ काबू इन जज्बातों पर ,

तेरी बातों में भी एक अज़ब गहराई थी
बेवक़्त वक़्त या हम ही सख्त ,

बहती साँसे औ धड़कन जो ठहराई थी
बस याद है अब ,तुम कैसे तब

शरमाई , मुसकाई फिर घबराई भी
बेशक दूरी इकतरफा है , इश्क में अब भी गहराई थी

– मनोगुरु –

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Manoguru

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10 thoughts on “सुनो बे-जुबान बोलती जो — मनोगुरू

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