बसंत कुमार शर्मा , जबलपुर

माँ  सुख हो या दुख, हर सांचे में, मिट्टी जैसी ढलती माँ मैं तो अब तक जान न पाया, कब सोती कब जगती माँ धन दौलत की खातिर बेटा, गाँव छोड़कर चला गया,  अच्छे दिन की आशा पाले, रही स्वयं को ठगती माँ दीवाली पर सजते देखे, घर आँगन चौबारे सब  रहे भागती और दौड़ती, पता नहीं कब सजती माँ बेटी और बहू की खातिर, जाने क्या क्या जोड़ रही,  सपने बुनकर अलमारी में, कितने…

"बसंत कुमार शर्मा , जबलपुर"

“मेरी इंदौर यात्रा” भाग-2 (मनोगुरु)

हाँ तो बात कहाँ तक पहुँची थी कि मैं उस इकलौते डिब्बे का कुमार विश्वास था मानो , फिर धीरे -धीरे सबने अपना-अपना हुनर दिखाना शुरू कर दिया |कोई हसा रहा था तो कोई मेरी ही तरह अपनी कविताओ को पेश करने लगा | तभी एक शख्स ने, अरे…! उम्मीदवार ने ही अपनी कलाकारी को मेरी नज़रो के सामने रख दिया , जिस पर मेरी निगाहे भी टिक गयी |नाम तो आज भी याद है…

"“मेरी इंदौर यात्रा” भाग-2 (मनोगुरु)"

कवि मयंक मिश्रा ” रायबरेली “

जो बीत गया है वो कभी आ नही सकता कोई वक़्त से पहले यहा कुछ पा नही सकता जीवन है एक अनमोल सफर देखकर चलना कुदरत का भजन कर कोई ठुकरा नही सकता कवि मयंक मिश्रा रायबरेली   मेरा दिल तोड़ने वाले तेरा दिल टूट जायेगा। सवेरा है तो मुस्कालो अँधेरा भी तो आयेगा समय अच्छा तो सब संग हैं मगर इतना न इतराओ । बुरा जब वक़्त होगा तो न कोई पास आएगा। कवि…

"कवि मयंक मिश्रा ” रायबरेली “"

“भटका राहगीर”

दुख किसे कहते है हव्वा के बेटे जो तुम जान जाते तो कभी दुख न मनाते क्या है दुख लकड़ी के कुंदे से पूछो जिस पर घिघ्गी बंधे बेजुबानों की मुंडियां रख उड़ा दी जाती है लोहे के तेज धार छुरे से पूछो जो खून के आंसू रोता है जब जब गिराया जाता है डर से थरथराती गर्दनों पर दुख उन दीवारों से पूछो जो झेलती है मरती चीखों को सांस रोक सुनती है मौत…

"“भटका राहगीर”"

“सीमा से चेतावनी” – प्रवेश चौधरी (जाना का दीवाना)

कब तक शेर सहेंगे इन नेताओं की लाचारी को ! अब तो जल्दी खत्म करो इस पापी अत्याचारी को!! जब तक खत्म ना होगा यह बाज नहीं अब आएगा! दे दो आदेश अब वीरों को पाकिस्तान खत्म हो जाएगा!! आपकी बातचीत के कारण कितने सैनिक मारे जाते हैं! पत्नी उनकी विधवा होती बच्चे अनाथ हो जाते हैं!! बहुत हो गया मोदी जी इस पाकिस्तान का नाश करो! दिखला दो ताकत भारत की इस का जड़…

"“सीमा से चेतावनी” – प्रवेश चौधरी (जाना का दीवाना)"

“इकतरफ़ा रिश्ते” + “जिसकी दुनिया है” (मीरा श्रीवास्तव)

“जिसकी दुनिया है” भगवान तेरी इस दुनिया में क्यूं दिल ठुकराये जाते हैं क्यूं चाहने वालों के अरमां मिट्टी में मिलाये जाते हैं दोलत शोहरत के रिश्ते नाते बाकी सब दफ़न कर दिये जाते हैं मतलब के सब रिश्ते नाते बाकी सब छोड़ दिये जाते हैं होती है बुराई की पूजा इस तेरी अंधी दुनिया में बाकी ‌हर इन्सान आंसू की तरह मिट्टी में मिलाये जाते है जीवन बगिया के मालिक तेरी इस दुनिया की…

"“इकतरफ़ा रिश्ते” + “जिसकी दुनिया है” (मीरा श्रीवास्तव)"

कविता कवि का धर्म है (कवि प्रमोद विषधर)

          कविता कवि की जाति है कविता कवि का धर्म  सर्व प्रथम कविता लिखे कवि का ये ही कर्म  मोह लोभ को छोड़ कर बँधे प्रेम की डोर मानवता के गीत हित स्वर गूँजें घन घोर  काम वासना लिप्त जो करते प्रेम प्रचार संस्कार का जगत में करते वह संघार बदनामी का भय रहे होता नहि वह प्यार प्रेम कभी चाहे नहीं बदले में आभार प्रेम किया जाता नहीं हो जाता…

"कविता कवि का धर्म है (कवि प्रमोद विषधर)"

“मेरी इंदौर यात्रा” भाग-१ (मनोगुरु)

दरअसल बात उन दिनों की है , जब मैं भी सरकारी नौकरी की परीक्षाओं के अग्निकुण्ड में गोते लगा रहा था | एक बार पुनः उसी सिलसिले मैं इंदौर की ओर रवाना हुआ लेकिन इस बार का सफ़र यादगार रहेगा इस बात का अंदाज़ा तो नही था। खैर वही हर बार की तरह मेरा कहना कि , ” कल देखा किसने” सो मैं भी बस मस्ताना सा चल दिया । लेकिन समस्या यह थी की…

"“मेरी इंदौर यात्रा” भाग-१ (मनोगुरु)"

— विदाई —(दिनकर राव दिनकर)

— विदाई — बेटियाँ धन पराया मैं कैसे कहूँ गम जुदाई का बेटी मैं कैसे सहूँ फिक्र तेरी है मुझको तू सुन लाड़ली मैं सजाता हूँ रश्मों की इक पालकी है रिवाजों की दुनिया निभाना तुझे जाके ससुराल तू भूल जाना मुझे गुड्डे गुड़िया भी ले जा खिलौने तेरे ले जा यादों के बचपन सलोने तेरे माँ सिसकती है तू देख ले भर नज़र छूटता जा रहा आज बाबुल का घर देख भाई बिछड़ता हुआ…

"— विदाई —(दिनकर राव दिनकर)"

”अल्फाज़ो की दुकान” (अतुल हिन्दुस्तानी)

“बिटिया” ममता का भव सागर होती हैं बिटिया, कुछ अनमोल जेवरों की मोती हैं बिटिया छोड़ घर बाबुल का कुछ अनजान बन, दूसरे बाबुल का घर बनती हैं बिटिया तमाम रंग महोब्बत के ज़रूर हैं मगर, प्यार का एक रूप बताती हैं बिटिया बेटे ही नहीं सपनों के बुनकर, आज तो सपनों को भी सॅवारती हैं बिटिया पूजते तो खूब हम सब कन्याओं को, पर क्यों किसी कोख में रोती हैं बिटिया अतुल हिंदुस्तानी (@अल्फ़ाज़ों…

"”अल्फाज़ो की दुकान” (अतुल हिन्दुस्तानी)"

नज़्म औ गजल (रजत मिश्रा )

कभी तारों सा तू जल, कभी रातों को जला, कभी दुनिया पे भी हंस, कभी दुनिया को हंसा, तू पहलू में बिठा, ज़रा ला के ज़िंदगी, कुछ किस्से उसके तू, फिर उसको ही सुना, कभी बहरा बन के सुन, कभी गूंगा बन के गा, जो भी मांगे ज़िंदगी, तू इसके पास ला, ज़रा जीना आसां कर, ज़रा मसलों को बढ़ा, तू उधारी की भी पी, तू उधार भी पिला, अभी दोनो साथ हैं, कुछ सांसें…

"नज़्म औ गजल (रजत मिश्रा )"