फिर भी दहेज जरूरी है (शैलेन्द्र वर्मा)

उम्र गुजारी हमने बेटी का दहेज जुटाने में, ये कमर झुकती गई बच्चो को पढ़ाने मे। ……. एक एक दिन गुजरता वेतन के इंतजार मे, चप्पल घिस गयी जी.पी,एफ निकालने मे। ……. सरकारी कर्मचारी सेहरा मक्कारी का सर पे हे…, किसे बताएँ क्या सहा भष्टाचार से दामन बचाने मे ……. आधी पगार तो इ.एम.आई मे चली जाती हे यारो, झुरिया चेहरे पे आई खिचतान के घर चलाने मे…। …….. रोज़ डाँट सुनते बोस कि लेट दफ्तर…

"फिर भी दहेज जरूरी है (शैलेन्द्र वर्मा)"

“मनोगुरू”आ गया है

सोचता हूँ कि लिखना बन्द कर दूँ….. खुश मत हो मनोगुरू लिखेगा……हाँ लिखेगा.. कल जब दिखूँ कहीं मशहूर लेखकों की फेहरिस्त में तो ये मत कहना कि – “मुझे तो पता था कि वो लेखक बनेगा”। खैर कह देना कोई फर्क नहीं पड़ता अब क्यूँकि “समाज” को बचपन से “समझ” लिया है। मजा ही लेता है वो अपना कहा जाने वाला -“समाज” अरे कुछ को अंग्रेजी आती है ना तो उनको अवगत करा दूँ कि…

"“मनोगुरू”आ गया है"

“इंसानियत खो चुकी है” (अशोक मिश्रा)

नफरतभरी इस आँधी में इंसानियत खोने लगी। इंसान को इंसान से ही ईर्ष्या होने लगी। जाति, भाषा और मजहब पर सियासत हो रही। सत्ता सुख की भूख से आत्मा सियासी रो रही । भूख से लालच बढा ईमान पर भारी पड़ा। भरने लगा अन्याय, अत्याचार, पापों से घड़ा। तब उस सियासत से रियासत दिन दूनी होने लगी। इंसान को इंसान से ही ईर्ष्या होने लगी ।। आज सरहद पर समस्या बद से बदतर हो रही।…

"“इंसानियत खो चुकी है” (अशोक मिश्रा)"

“वो आवाज कुछ खास थी”

मनोगुरू हर वक्त खुद को खुशनसीब समझता है जब रोज किसी नए हुनर औ जुनून से रूबरू होता है । आज यही नजरें बस वही हुनरबाज को तलाशती हुई गुजर रही थी कि दिल को एक आवाज सुनाई दी, सुनता तो बहुत कुछ हूँ पर आज कुछ खास सा लगा तो फिर से सुना तुम्हें……अरे हाँ तुम ही जो हो तो हूबहू हमारी ही तरह पर ये आवाज तुम्हें खास बना रही है । अब…

"“वो आवाज कुछ खास थी”"

हाँ मैं “अशांत” हूँ……(इंदौर)

जिसे दुत्कार खुद से मिल रहा क्या आस औरों की , झुका जब शीश ही , औकात क्या है शेष पैरों की , बड़ी उलझन भरी है ज़िंदगी , उसकी कहानी भी , न अपनों ने मुझे समझा , करूँ क्या बात गैरों की ! अशांत . (इंदौर ) भरे उत्साह में अर्थी बड़ी गमगीन लगती है , बिना अपराध की कोई सजा संगीन लगती है , भले हो दिन उजाले से भरा पर कुछ…

"हाँ मैं “अशांत” हूँ……(इंदौर)"

” परम सत्य ” – ( शारदा मेहता )

“परम सत्य” उस एक परम सत्य ने , हमेशा से सबको छला है । वो मृत्यु है , कर देता है चेतनाशून्य , सक्रिय शरीर को । बिना किसी आहट के, सेंध लगा जाता है इस शरीर में । खींच ले जाता है प्राण वायु , निस्पंद कर जाता है, इस काया को । निर्जीव कर जाता है । पूर्ण विस्राम दे जाता है । छोङ जाता है मिट्टी का काया , मिला देने के…

"” परम सत्य ” – ( शारदा मेहता )"

वरुण आनंद (शायर लुधियानवी)

सज़ा ए ज़ीस्त बढाने का काम करते हैं जो मेरी जान बचाने का काम करते हैं سزا ئے زیست بڑھانے کا کام کرتے ھیں جو میری جان بچانے کا کام کرتے ھیں हमारा नाता है उस क़ैस के घराने से कि हम भी ख़ाक उड़ाने का काम करते हैं ہمارا ناتا ھے اس قیس کے گھرانے سے کہ ہم بھی خاک اڑانے کا کام کرتے ھیں हमारी आँख के अश्कों को रायेगाँ न समझ ये…

"वरुण आनंद (शायर लुधियानवी)"

गर तुम पढ़ लेती

बात बेबात ऐसे न सताओ उनको जख्म दो पर ऐसे न भुलाओ उनको ये जो आखों में रखे है मोती थोड़े ये अमानत है ऐसे न लुटाओ उनको बातो बातो मे ऐसे न बहलाओ उनको जरा सी बात है थोड़ा सा मनाओ उनको वो मान जाएगें ऐसी तो कोई बात नही ये तो अपने है ऐसे न रूलाओ उनको – आशुतोष पाण्डेय शब्द सा तुम बनी, अर्थ मै हो गया। आत्मा तुम बनी, देह मै…

"गर तुम पढ़ लेती"

हाँ “योगी” बहरुपिया है…

मैं बहरुपिया बन जाता हूँ कभी शराब तो कभी दुआ बन जाता हूँ , मैं यूँ करता हूँ कि अब बहरुपिया बन जाता हूँ… उसके बेचैन होठ लब-ए-लिखावट की शिकायत करते हैं सो करीब आकर उन साँसों का काफिया बन जाता हूँ… मैं जिस्मों तक रूह की खबर ले जाने लगा हूँ , कभी शायर तो कभी डाकिया बन जाता हूँ…. उसके कई ख्वाब मेरे हकीकत से होकर गुजरते हैं, सो कभी कातिल तो कभी…

"हाँ “योगी” बहरुपिया है…"

“वो गज़ल और हम”- राहुल कुमार (लेखक)

आज आख़री दफ़ा तन्हा हुवे हैं हम, पहली दफ़ा ग़ालिब समझ मे आये। ……..राहुल कुमार लिए हस्ती अपनी जब गुमनाम से मिलते हैं, अब मेरे लोग भी मुझको तेरे नाम से मिलते है। मग़रूर हो तुम भी तो हमे भी कोई जल्दी नही, चलो तो फिर तुमसे कभी आराम से मिलते हैं। …….राहुल कुमार रफ़ीक सारे अपने दुनिया-दारी में लगे हैं, हम बेवक़्क़त अब भी शायरी में लगे हैं। आफ़ताब को पहली दफ़ा सक हुवा…

"“वो गज़ल और हम”- राहुल कुमार (लेखक)"

“तुम नहीं समझोगे” – मीरा श्रीवास्तव (गुरू माँ)

—– “तुम नहीं समझोगे” —– महलों में रहने वालों तुम क्या समझोगे जज्बातों को क्या समझोगे रिश्ते नातों को क्या समझोगे दुखियारी के रूनदन को क्या समझोगे अन्तर मन की वेदना को क्या समझोगे गरीब की लाचारी को क्या समझोगे मध्यम श्रेणी की पीड़ा को क्या समझोगे दुनियादारी को, क्या समझोगे ममता के बन्धन को महलों में रहने वाले सोने की चमक से चमक रहे नींव की ईंट की पीड़ा तुम क्यों नहीं समझ रहे…

"“तुम नहीं समझोगे” – मीरा श्रीवास्तव (गुरू माँ)"