मैं उस युग में जाना चाहती हूँ

मैं उस युग में जाना चाहती हूँ हुआ प्रथम अपराध जहाँ पर सहा था अत्याचार जहाँ पर उस युग को मिटाना चाहती हूँ। जब हाथ उठे थे औरत पर क्यों वह चुपचाप सह गई उसकी इस गलती पर औरत जाति अबला रह गई तुने क्यों प्रतिकार किया ना क्यों खामोश तू रह गई जो गलती औरत ने की थी उसे मिटाना चाहती हूं मैं उस युग में जाना चाहती हूं। कब मानव विभक्त हो गया…

"मैं उस युग में जाना चाहती हूँ"

इंसां तुम्हीं को रास ना आया

मुफ़लिसी ही मिली हिस्से , निवाला कर्म का खाया तेरी बस्ती का इंसां ये , नजर तेरी ही ना आया नक्काशी की तेरे ही घर , मगर ना आशियाँ पाया, वो काला आसमाँ छत पर , मैं रूखी नींद भी पाया मजदूरी कहो या आस , दो रोटी की कह लो तुम तुम्हारी ही ज़मीं जोती , क्यूँ हिस्से कर्ज़ ही आया खदानें कोयले की थी , ये सोना खोद मैं लाया वो रोशन अब…

"इंसां तुम्हीं को रास ना आया"