“काश कोई सुन लेता” part2 — मनोगुरू

कोई कह दो ना कि रहने भी दो अब , भला मेरा क्या कसूर। शायद यही कि ल़ड़की हूँ फिर भी बस करो बेहद दर्द हो रहा है तुम्हारे नुकीले बेरहम औजारों से ।

माना कि अभी इस लायक नहीं हुई कि अपनी कराहती और बिलखती आवाज को आपकी बे-रहम , बेदर्द भावनाओं को सुना सकूँ मगर तुम सब तो बाहर की दुनिया में हो क्या कभी कोई चोट लगी या कटे नहीं हो जो दर्द का अहसास नहीं हो रहा है । लेकिन मुझे तकलीफ हो रही है और बेहद असहनीय दर्द भी ।

अगर वाजिब वजह ही मालूम होती जिसकी सजा अब मुझे दी जा रही है , तो शायद खुद को ही कोसती पर मेरे ही अंगों को काट काट कर इस तरह कहाँ और क्यूँ ले जा रहे हो ?

तुम्हारे धारदार सोच के ये औजार कभी मेरे नन्हे हाथ तो कभी छोटे छोटे पैरों को कतरते जा रहे हैं। कल इन्हीं हाथों से पापा को थामकर घूमती भी और पैरों में छन छन करती पायलों से घर में चहकने के सपने सँवारे हैं मैंने , जिनके बे-तहाशा टुकड़े किए जा रहे हो

रहने दो अब बस भी करो कुछ साँसें ही बची हैं , आस तो दम तोड़ चुकी है । मेरी हिम्मत टूटने लगी है अब लाल रंग ही लहू का दिख रहा है जिससे तुम्हारी वही रंगीन दुनिया ने देखने पर मजबूर कर दिया।
शायद तुम मेरी जगह नहीं हो ना तभी अहसास नहीं हो रहा है और इस तरह अनसुनी कर रहे हो इस कराहती कोख की दर्द भरी आवाज , खैर मैं मासूम भी किससे रहम की गुहार लगा रही हूँ ।

लो आखिर कर ही दी ना तुमने अपने मन की , उखाड़ फेंका मुझे और मेरी ख्वाहिशों को बे-जान समझ । यही थी तुम्हारी बाहर की दुनिया जो खुद ही बनाकर उजाड़ती भी है और मुझ अभागन को देखो जो इसी को इक पल निहारने का ख्वाब बना रही थी माँ की कोख को भी महफूज समझ….

माना कि तुमको कुछ डर या चिंता रही होंगी मुझसे लेकिन ये बनावटी कायदे ,फर्क और रस्मों को आखिर बनाया भी तो तुम्हारे समाज ने ही होगा और मन मुताबिक जवाब भी होंगे सबके पास । होंगे भी क्यूँ नहीं जब खुद ही बनावटी अपनापन दिखाकर काट भी दिया। फिर भला मुझ बे-कसूर को दम तोड़ना पर मजबूर क्यों होना पड़ा।

अब शायद खुशकिस्मत महसूस कर रही हूँ कि अगर यही रवैया है बाहर की दुनिया का तो बेहतर है ,कि कोख में ही बे-रहमी से मारी गयी पर तुम सबने बखूबी दम घोंट ही दिया मेरी इसी कराहती कोख की आवाज को अपनी आँख , कान पर हैवानियत का पर्दा डालकर अनसुना सा करते हुए।
खैर बाहर आती तो शायद मुझे बयान करने वाले इस कलमकार को भी देखती जिसने मेरी भावनाओं को बिना देखे ही हूबहू सुना दिया…….

तुमने भी अब शायद सुन ली होगी आवाज…..

– मनोगुरू

प्रतिक्रिया जरूर दीजिए अगर समय दिया है इस हकीकत को समझने में और साझा भी करें ताकि यही कराहती कोख की आवाज हर उस समाज व परिवार तक पहुँचे जो स्वयं बेटी रूपी भय के निर्माण कर उजाड़ते हैं बेजान के भविष्य को…….

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काश…! कोई सुन लेता (part1)

वो गरीब की झोपड़ी

Manoguru

Hey...! My name is Abhishek Tripathi and pen name "Manoguru". Thanks a lot to be a member of my life by my these startups. I hope that you are easily understand me and my aim to change something in everyone. You know that -" Nobody can do everything but Everybody can do something". so activate your inner powers, talent, sensitivity , sincerity etc. Be a helping human... keep connected....... thanks again

27 thoughts on ““काश कोई सुन लेता” part2 — मनोगुरू

  1. Chitra mishra says,(7 Feb, 2018.)Amazing thoughts,&very nice.Really I am proud of you &God Bless you.👌👌👌👌👌

  2. Very heart touching story.you have given words to a baby girl.she might be thinking same as you have written.
    But in my opinion,they are very unlucky who don’t have girl child.
    I have a baby girl of 10 months.and I am enjoying my life’s golden movement with my Angel

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