“झुलसती भावना”— मनोगुरु

कलम का उकेरना शुरू कर रहा हूँ रश्मि के घर से ताकि आप भी रूबरू हो सकें उसके परिवार से और उस आँगन से जिसकी रश्मि ही रौनक थी | उस आँगन में रश्मि ने छन .- छन छनकती पायलों को बाँध पहला पग भी रखा था |

किसी कोने में भाई-बहिन सहेलियों के साथ घर घर भी खेला तो उसी दहलीज पर बैठकर दादी माँ से बालों की चोटियाँ भी करवाई |छत पर बैठकर कभी-कभार रोना धोना भी किया , तो कभी कभी माँ के साथ रोटियाँ बेलने की ज़िद भी की बचपन में|

सारे परिवार की लाड़ली बिटिया रश्मि शरारतों और मीठी मीठी यादों को सभी के मान में पिरोती हुई बड़ी हो रही थी | सुंदर तो थी ही भला माँ पर जो गई है , ऐसा सभी कहते थे रश्मि को | बचपन से ही वो पढ़ाई में भी होशियार थी सो काफ़ी ऊँचे सपने भी थे मानो मौका मिले इक पल को तो सैर कर आए नीले अंबर की |

नर्सरी से शुरुआत की और कब बारहवीं के इम्तिहाँ दे दिए पता ही नहीं चला और तो और बेहतरीन अंकों से उत्तीर्ण भी हुई| रश्मि आज तो बेहद खुश भी थी , अरे….! हो भी क्यूँ ना कॉलेज जो जाएगी| अब नये दोस्त , नयी किताबें , नया मौहाल और भी बहुत कुछ और हाँ थोड़ी आज़ादी भी उन किताबों से लदे बस्ते से भी|

सोचते सोचते रश्मि का कॉलेज जाना भी शुरू हो गया | कुछ सहेलियाँ भी बनने लगी और कुछेक ल्डके दोस्त भी व सिलसिला चल ही रहा था हसी खुशी लेकिन साथ में ही कुच्छ अलग सा भी हो रहा था | अलग था तो वह रश्मि के साथ पढ़ने वाले अमन का व्यवहार

जो कहीं ना कहीं उसे खटक रहा था और अमन है क़ि इसे इकतरफ़ा ही सही पर प्यार का नाम दे चुका था | बस यही एक वजह भी थी जो रश्मि को परेशान कर रही थी | आए दिन अमन की इज़हार करने तथा नई अनोखी हरकतों से बुरी तरह तंग हो चुकी थी

क्यूंकी माँ-बाप, परिवार की इज़्ज़त का ख्याल भी था उसे तो इन सबसे व कोसों दूर थी शुरुआती दौर से ही | रश्मि का जीना मुश्किल हो रहा था पर घर पर भी शिकायत नहीं कर रही थी क़ि शायद ठीक हो जाएगा सब कुछ पर अमन अपनी मनचली हरकतों से बाज नहीं आ रहा था |

रश्मि चूँकि समझदार थी तो उसे भी समझाने की कोशिश भी की क़ि – “माना प्यार होना वाजिब है और कई दफ़ा होता भी है पर प्यार में ज़बरदस्ती कैसी”, ये जबरन प्यार….? आख़िर यह कौन सा तरीका हुआ | जैसे तैसे तीन साल भी गुज़रे और रश्मि की पढ़ाई भी ख़त्म हुई |

अब जो बड़ी थी वही घर में तो रिश्ता भी उसी का पहले तय होना लाजमी था| वैसे रश्मि भी मना करती शादी को पर अभी भी उन उलझनों ने पीछा कहाँ छोड़ा था, तो उसने भी सोचा शायद शादी होने के बाद कुछ राहत मिलेगी क्यूंकी हर चीज़ की एक सीमा होती है जो क़ि अमन महाशय लाँघ रहे थे हर बार…| शादी के बाद बेहतर कल की उम्मीद रख , सब कुछ ठीक होने की आस में थी रश्मि…शायद तभी उसने सप्ताह में एक बार मंदिर जाना भी शुरू कर दिया था, भगवान को ही सहारा समझ लिया था मानो|

हर रोज की तरह आज भी रश्मि सुबह सुबह तैयार हुई मंदिर जाने को अपने आज से अंजान जो थी अभी तक खैर कल देखा भी किसने| दूसरी ओर अमन की सनक फिलहाल कम नहीं हुई थी अब भी| मंदिर से लौटते वक़्त रास्ते में तेज़ रफ़्तार से आती हुई बाइक पर सवार दो नकाबपोश लड़कों , जिनमें से एक अमन ही था तेजाब से भरी शीशी को रश्मि पर फेंकता हुआ रफूचक्कर हो गया । प्यार की आड़ में वासना की कामना कहूं तो बेहतर ही होगा जिसने अमन के दैत्यरूपी स्वरूप में रश्मि को बुरी तरह झुलसने पर मजबूर कर दिया । जलन और दर्द इतनी जोर से था मानो देखने वाले कि रूह ही काँप जाए , फिर रश्मि को जो पीड़ा तेजाब की वजह से हो रही थी वह अकल्पनीय थी । हालत बिगड़ती जा रही थी सो उसे नजदीक ही अस्पताल में भर्ती करवाया गया। बदन पूरी तरह झुलस चुका था , उसे दर्द से कराहता देख डॉक्टर भी हिम्मत नहीं कर पा रहे थे ऑपरेशन की । आज उसी रश्मि को पहचानना नामुमकिन सा था जिसकी खूबियों का बखान करते हुए कोई थकता नहीं था । माँ-बाप का ज़िक्र ही क्या करूँ , वो तो मानो जीतेजी ही धराशायी हो गए थे । कल जिस बदन पर हल्दी का लेप होता वह मलहम और पट्टी से ढँक चुका था और हाथ मेंहदी से लाल होते वो आज खून से छिल-छिलाए हुए लाल ही नजर आ रहे थे । तमाम कोशिशों के बाद जैसे-तैसे रश्मि को मौत के मुंह से निकालने में कामयाबी मिली या यूँ कहें कि उसके वजूद को वो तेजाबी फितूर जला नहीं पाया था । अमन की गिरफ्तारी हुई और कानूनी कार्यवाही भी पर उतनी नहीं जो आगामी अपराध को भयभीत कर सके चूँकि निरंतर हो ही रहे हैं ये। रश्मि ने अपने सपनों को नए अंदाज में नई जगह दी और एक संस्था के तौर पर अपनी ही तरह पीड़ितों को जीने की वजह दे रही है साथ ही नजीर भी बन रही है समाज के लिए । अन्ततः रश्मि के जज्बात को अमन की दरिंदगी खरोंच तक नहीं पहुंचा सकी क्योंकि वो ज़िंदा है ज़िंदादिली से………..

अभिषेक मनोगुरु

Manoguru

Hey...! My name is Abhishek Tripathi and pen name "Manoguru". Thanks a lot to be a member of my life by my these startups. I hope that you are easily understand me and my aim to change something in everyone. You know that -" Nobody can do everything but Everybody can do something". so activate your inner powers, talent, sensitivity , sincerity etc. Be a helping human... keep connected....... thanks again

3 thoughts on ““झुलसती भावना”— मनोगुरु

  1. मैं यही कहूँगा
    बेशक इश्क़ कर हक़ हैं तेरा
    पर अँधा बन कुचल मत इश्क़ को

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