पत्थर में भगवान कहां…..?

पत्थर में भगवान कहां…..?

मूक मूर्ति है मंदिर में, पत्थर में भगवान कहां।
पत्थर दिल ये लोग हो गए, लोगों में इंसान कहां।
मेरा धर्म मैं खुद देखूंगा, मत धर्म के ठेकेदार बनो।
आखिर किस धर्म ने कहा, मासूमों पे अत्याचार करो।
बेटी सी फूल सी बच्ची वो, तेरे हाथ ज़रा भी कांपे न।
आंसू, दर्द, चीख-पुकार, गुहार को सुन तू भांपे न।
क्या बीत रही होगी उसपे, क्या बीतेगी परिवार पे अब।
क्या हवस में इतने अंधे थे, कि टूट पड़े लाचार पे सब।
तू मां से शायद जना नहीं, जो औरत की इज़्ज़त करता।
जो होती एक तेरी बेटी, तो न ऐसी ज़ुर्रत करता।
ले हवस के डोरे आंखों में, घूम रहे हैवान यहां।
पत्थर दिल ये लोग हो गए, लोगों में इंसान कहां।
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थू तुम्हारी जाति पे, तेरे धर्म पे।
कर्म पे, दुष्कर्म पे।
तेरी रीति पे और रिवाज़ पे।
जिस माहौल में हुई परवरिश,
लानत है ऐसे समाज पे।
तेरे बाप पे, तेरे पाप पे।
इस झूठे धरम और जात पे।
हर हिन्दू पे, मुसलमान पे।
अल्लाह पे और भगवान पे।
न कोई ऊपरवाला था,
दुनियां में बस इंसान थे।
वो भी दफ़न हुए अब तो,
अब मिलते हैं इंसान कहां ।
पत्थर दिल ये लोग हो गए, लोगों में इंसान कहां।।
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आसिफा, ने था क्या किया,
जो तूने दिया, उसे मौत को।
सहमी सब देश की बेटियां,
क्या कर दिया,
भूल कर के हर खौफ को।
अरे बोल तो,
हां लोग वो,
हैं कहाँ जो हरदम कोसते थे।
छोड़ वो, उस शख्स को,
छोटे कपड़ों को दोष देते।
गंदी सोच से थे घिरे हुए,
गिरे हुए,
गिरा हुआ ही सोचते थे।
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मुझे घिन आती, अब है मुझपे,
मरदानगी पे शर्मिंदा हूँ।
जब मर ही चुका इंसान मेरा,
जाने अबतक क्यों ज़िंदा हूँ।।
धर्मों की मेज़बानी करने, चले हैं खुद शैतान यहां।
पत्थर दिल ये लोग हो गए, लोगों में इंसान कहां।।
मूक मूर्ति है मंदिर में, पत्थर में भगवान कहां।
पत्थर दिल ये लोग हो गए, लोगों में इंसान कहां।

Writer – Akshar Pandit

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