“इंसानियत खो चुकी है” (अशोक मिश्रा)

नफरतभरी इस आँधी में इंसानियत खोने लगी।
इंसान को इंसान से ही ईर्ष्या होने लगी।

जाति, भाषा और मजहब पर सियासत हो रही।
सत्ता सुख की भूख से आत्मा सियासी रो रही ।
भूख से लालच बढा ईमान पर भारी पड़ा।
भरने लगा अन्याय, अत्याचार, पापों से घड़ा।

तब उस सियासत से रियासत दिन दूनी होने लगी।
इंसान को इंसान से ही ईर्ष्या होने लगी ।।

आज सरहद पर समस्या बद से बदतर हो रही।
आगे से सेना गोलियाँ, पीछे से पत्थर खा रही।
कुछ सैेन्य-सेवा अरु शहादत पर सियासत कर रहे।
आतंकी-पत्थरबाजों की खुलकर वकालत कर रहे।।

अब आतंक की गोली से मृत हर आत्मा कहने लगी।
इंसान को इंसान से ही ईर्ष्या होने लगी ।।

आज माँ, बेटी, बहन जाती कभी बाहर कहीं।।
साँस अटकी रहती जब तक आ जाती वापस नहीं।
चोरी, झगड़ा, मारापीटी, हत्या करना आम है।
इंसान बनकर कर रहा हैवानियत का काम है।

क्या सौहार्द, शान्ति और मुहब्बत, माकूलियत खोने लगी।
इंसान को इंसान से ही ईर्ष्या होने लगी ।।

-Ashok mishra

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