गर तुम पढ़ लेती

बात बेबात ऐसे न सताओ उनको
जख्म दो पर ऐसे न भुलाओ उनको

ये जो आखों में रखे है मोती थोड़े
ये अमानत है ऐसे न लुटाओ उनको

बातो बातो मे ऐसे न बहलाओ उनको
जरा सी बात है थोड़ा सा मनाओ उनको

वो मान जाएगें ऐसी तो कोई बात नही
ये तो अपने है ऐसे न रूलाओ उनको

– आशुतोष पाण्डेय

शब्द सा तुम बनी, अर्थ मै हो गया।
आत्मा तुम बनी, देह मै हो गया।।

मै तो व्याकुल रहा, बिन तेरे हर कहीं।
राधिका तुम बनी, कृष्ण मै हो गया।।

मै पतगां सरीखा, जला रात भर।
तुम दियाली बनी, दीप मै हो गया।।

आशुतोष पाण्डेय

इस अनिश्चित भावना की डोर कब तक बान्धता मै
इस अधूरी जिन्दगी को किस तरह से साधता मै

इस ह्रदय की वेदना से किस तरह से जूझता मै
प्यार अपना दे दिया, और किस तरह से पूजता मै

– आशुतोष पाण्डेय

नजर भर देखने को आज शायद हम भी बैठे है।
तुम्हारे साथ कुछ पल बिताने हम भी बैठे है।।

भले गुस्ताख दिल कुछ न कहे, पर तुम जरा सुनना।
ये किस्सा आज सरे महफिल सुनाने हम भी बैठे है।।

गुजर रही थी सारी सदाएं महज मायूसीयां लेकर।
तेरी खुश्बू से लिपटे खत लेकर हम भी बैठे है।।

ये जो रूठने की तुम नयी तरकीबें लाते हो।
बस इसी को दिल से लगाए हम भी बैठे है।

– आशुतोष पाण्डेय

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हाँ “योगी” बहरुपिया है…

“वो गज़ल और हम”- राहुल कुमार (लेखक)

Manoguru

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