Author Arjun Prasad

प्रिय फेस बुक फ्रेंड्स मैं सरकारी सेवा करने के साथ- साथ सामाजिक और साहित्यिक सेवा से भी बड़े पैमाने पर जुड़ा हुआ हूँ. और ऐसे ही सृजनकारी कलाकार व्यक्तित्वों को पसंद भी करता हूँ मैं किसी राजनीतिक दल अथवा पार्टी से बिल्कुल भी नहीं जुड़ा हुआ हूँ. मैं अनाप-शनाप मित्रों की बड़ी भीड़ या जमघट को कदापि पसंद नहीं करता हूँ मेरे सार्थक और सृजनशील सामाजिक सरोकार वाले मित्रों की तादात बेशक बहुत ही कम हो, मुझे पूर्णतया पसंद है. मेरा फेस बुक पेज कोई ऐसा विज्ञापन का प्लेट फॉर्म नहीं है जहाँ कोई भी व्यक्ति अपने प्रचार- प्रसार के लिए जुड़कर मेरा कीमती समय बर्बाद करे. मित्रों मेरे लिए धर्म सर्वोपरि है और वह धर्म किसी विशेष समुदाय, मजहब अथवा वर्ण तक सीमित नहीं है वह धर्म जो हर मजहब के इंसान के लिए बिल्कुल एक सामान है. राजनीतिक हो अथवा मजहबी, मैं किसी प्रकार की कट्टरता बिल्कुल भी पसंद नहीं करता. मैं हर सम्प्रदाय और मजहब का सामान रूप से आदर करता हूँ. मैं काल्पनिकता के बजाय वास्तविकता यानि यथार्थ को पसंद करता हूँ मैं उस व्यक्ति को बहुत पसंद करता हूँ जो सामाजिक उत्थान और जागरूकता के लिए काम करता है और जिसे समाज की कुछ परवाह है. मैं ऐसे मनुष्य को बिल्कुल भी पसंद नहीं करता हूँ जो अंदर से कुछ और होते हैं और बाहर से कुछ और. मनुष्य को अंदर और बाहर से हमेशा एक ही होना चाहिए. जो लोग सबसे पहले अपने आपको न सुधारकर केवल दिखावटी रूप से समाज को सुधारने का प्रयास करने में जुट जाते हैं. ऐसे लोग मुझे बिल्कुल भी पसनद नहीं हैं. इसलिए मेरे पास मित्रता अनुरोध भेजने से पहले मेरी प्रोफाइल एक बार जरूर देख लें. अब जो लोग मेरी मित्रता के योग्य हों वे रहें और बाकी लोग मेरी मित्रता सूची से खुद बाहर हो जाएँ अन्यथा मुझे खुद हटाना पड़ेगा. मुझे यह भी मालूम है कि मेरे निःस्वार्थी मित्रों की तादात 100 भी कम है जबकि मित्रता सूची में 2500 से भी ज्यादा लोग हैं. धन्यवाद

प्रिय मित्रों
मासूम बच्चियों के साथ होने वाले बलत्कार के मामले पर आज समूचे देश में हाहाकार मचा हुआ है लेकिन कोई बुद्धिजीवी और ग्यानी-ध्यानी यह नहीं उजागर कर पा रहा है कि ऐसा हो क्यों रहा है? इस महामारी पर पिछले 4-5 वर्षों से मेरी कड़ी नजर रही है इसका मुख्य कारण जो मैनें देखा है वह यह है कि शिक्षा के प्रचार -प्रसार और सामाजिक जागरूकता के चलते कोई बालिग प्रौढ़ और समझदार स्त्री किसी बलात्कारी दानव के झांसे में आसानी से नहीं आती है वे अब अपना अच्छा-बुरा समझने लगी है. इससे परेशान होकर विकृत मानसिकता के बलात्कारी मासूम बच्चियों पर अपनी बुरी नजर रखने लगे हैं. और उन्हें ही अपना आसान शिकार बनाने लगे हैं यह काम किशोरावस्था की उम्र से लेकर युवा, जवान और बूढ़े लोग तक करने लगे हैं इसलिए अब समाज को अपने मासूम बच्चों चाहे कोई लड़का हो या लड़की दोनों पर कड़ी नजर रखने की सख्त जरुरत है साथ ही केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को पुलिस प्रशासन को इस अमानवीय और क्रूर अपराध पर कड़ी नजर रखने की हिदायत देने के साथ ऐसे अपराधियों से बिल्कुल सख्ती से निपटने का आदेश देना जरुरी है मेरे एक मित्र श्री एन. जी. त्रिपाठी जी ने अभी कल ही ऐसे अपराधियों को लिंग विच्छेद करने का दंड देने का सुझाव दिया है मेरे विचार से प्राचीनकाल की तरह आज फिर से ऐसे बलात्कारियों को ऐसी ही सजा देने की सख्त जरूरत है और अगर समाज के लोग ही उसे जान से मार डालें तो किसी व्यक्ति को किसी प्रकार से दण्डित नहीं किया जाना चाहिए. अपने बच्चों की सुरक्षा खुद कीजिए और उनकी और से किसी तरह लापरवाह मत रहिए. केवल सरकार के भरोसे मत रहिए इसी विचार के साथ धन्यवाद आपका अर्जुन प्रसाद

प्रिय मित्रों
हर मनुष्य के पास कुछ न कुछ अपनी बुद्धि और विवेक होता है. वह किसी सत्य और तथ्य को भलीभांति सोच और समझ सकता है परन्तु हमारी मानसिकता इतनी कमजोर और संकीर्ण हो चुकी है कि हम अपनी बुद्धि और विवेक से काम लेना बंद करके मारे आवेश में खुद को एक बड़ा समीक्षक बताने का प्रयास करने लगते हैं. यहीं हम सच और झूठ में फर्क करना बिल्कुल भूल जाते हैं. वैसे सिंधुघाटी सभ्यताकाल में जब तक समाज में किसी प्रकार का जातीय विभाजन और किसी तरह का भेदभाव नहीं था तब तक वह सभ्यता हर तरह से पूर्णतया सम्पन्न और सुखी थी. इसके बाद उत्तर वैदिककाल में उपनिषदों और पुराणों की रचना के साथ जाति -पाँति की घृणित कुव्यवस्था लागू होते ही वही एकजुट और समरसतापूर्ण समाज पूर्णतया छिन्न-भिन्न और अत्यंत कमजोर हो गया. इसके चलते यहाँ विदेशी हमलावरों के आक्रमण होने शुरू हो गए. परिणामस्वरूप इस विशाल भारत भूमि पर 710 साल तक उनका आधिपत्य बना रहा. उनके पतन के अंतिम चरण में यहाँ फ्रांसीसियों और अंग्रेजों का कब्ज़ा हो गया.आज हम अपनी जाति पर झूठमूठ में ही बहुत घमंड करते हैं लेकिन उन विदेशी ताकतों को रोकने का साहस किसी भी जाति और वर्ग के पास नहीं था. यह महान देश कभी किसी विदेशी शक्ति का उपनिवेश नहीं बन पाता. दरअसल उस समय हमारा जातीय अहंकार गहरी नींद में सो गया था. इसलिए आज जाति-पाँति के नाम पर किसी मनुष्य के साथ भेदभाव करना घोर अन्याय है. यही कारण है कि जब अन्याय और अत्याचार सहन करने वाले मनुष्य का स्वाभिमान जागृत होता है तो जिस प्रकार अपने बचने का कोई रास्ता न पाकर बिल्कुल सीधा-सादा हिरन भी शिकारी पर ही टूट पड़ता है उसी प्रकार वह दबा कुचला वंचित शोषित और पीड़ित मनुष्य भी बिल्कुल खतरनाक बनकर लड़ने- मरने को उतारू हो जाता है. अगर जाति -पाँति और वोट बैंक के नाम पर हम इस कुव्यवस्था के ही पोषक बने रहते हैं कि किसान का बेटा किसान ही बने और मजदूर का बेटा मजदूरी ही करता रहे तो यह हमारा दिमागी दिवालियापन के आलावा और कुछ भी नहीं हो सकता है. सर्वसमाज को विकास करने का एक समान सुअवसर अवश्य मिलना चाहिए क्योंकि अगर इस मानव समाज में कुछ लोग अपनी मनमर्जी मौजमस्ती करते रहें और और बहुत से लोग बिल्कुल गुलामी का जीवन ही जीते रहें तो इससे देश और समाज हमेशा बिल्कुल कमजोर ही बना रहेगा और जब सर्वसमाज विकसित तथा मजबूत होकर आगे बढ़ेगा तो देश और समाज निश्चय ही अपने आप बिल्कुल सुढृढ़ बनेगा। हमें हर हाल में विषमता का नहीं बल्कि .समता का पोषक बनना चाहिए। आज हमारी पुलिस की बदनामी किसी से भी छिपी नहीं है. इसका एकमात्र कारण यही है कि हम खुद ही पुलिस को ईमानदारी और निष्पक्षता से काम नहीं करने देते हैं.इस चक्कर में पूरे पुलिस प्रशासन की थू-थू होने लगती है. इसी प्रकार अन्य प्रशासनिक स्थानों पर भी एक पटवारी से लेकर डी.एम. तक को बुरी तरह प्रभावित करके उन्हें बिल्कुल निष्पक्षता और न्याय के मार्ग से हटाकर भरष्टाचार तथा अन्याय के कुमार्ग पर ठेल दिया जाता है. इसके बीच के अफसरों का कहना ही क्या है यही काम ज्यादातर हमारी न्यायपालिका का भी रहता है. जिसे अंदर होना चाहिए वह खुलेआम बाहर घूमता है और जिसे बाहर होना चाहिए वह जेल के अंदर ही पड़ा रहता है. किसी को जघन्यतम अपराध करके भी बहुत ही जल्दी छुटकारा मिल जाता है और किसी को बिलकुल निर्दोष होने पर भी वर्षों अदालतों के धक्के खाने पड़ते हैं. इसी तरह किसी को अपने महकमें में बहुत जल्दी प्रमोशन दे दिया जाता है और किसी को बिना किसी प्रमोशन के ही रिटायर कर दिया जाता है. किसी के उत्कृष्ट और सराहनीय कार्य की भी जानभूझकर घोर उपेक्षा की जाती है और किसी को जानभूझकर लाभ पहुँचाया जाता है अपनी बुद्धि और विवेक से काम लेन का मतलब नैसर्गिक न्याय के साथ कानून और नियमों का पालन करना है नियम और कानून के साथ खिलवाड़ नहीं करना है साथ ही यह भी एक कड़वा सच है कि उपद्रव ही ऐसी भाषा है जिसे सरकार अच्छी तरह समझती है ऐसे में अगर समाज का कोई वर्ग सरकार से अपनी मांगें मनवाने के लिए कोई आंदोलन करता है तो बुद्धिजीवी और विद्वान् लोगों को इस पर किसी प्रकार की टीका टिप्पणी करने से बिल्कुल बचना चाहिए. अगर हम ऐसा नहीं कर पते हैं तो इसका मतलब हम समाज में वही घिसीपिटी भरष्ट अव्यवस्था लागू किए जाने के पक्षधर हैं. समाज का कोई वर्ग जब किसी सरकारी असंतोष से बुरी तरह झुलस रहा हो तो उसे शांत कराने के लिए उस पर घी नहीं बल्कि पानी डालने की सख्त जरूरत होती है. लेकिन कुछ लोग इस तथ्य की गहराई को न समझते हुए उस पर तेल डालने की कोशिश करने लगते हैं. और उस आग को हवा देकर उसे अनायास भड़काने का प्रयत्न करने लगते हैं. जब हम मारे आवेश के कोई कुकृत्य करते हैं तब हम अपनी जातीय मर्यादा को तIक पर क्यों रख देते हैं? हमें अपना जातीय बल और बाहुबल उस समय भी याद रखना चाहिए यही सबसे बड़ी मानवता और न्याय है. किसी आंदोलन को हतोत्साहित करने का प्रयास तभी करना चाहिए जब वह किसी जाति वर्ग अथवा समुदाय विशेष के विरोध में हो अन्यथा अपना खून जलIने का कोई अर्थ नहीं रह जाता है सरकार से अपनी बात कहने का हक़ हर किसी को है यह बात हमें कभी नहीं भूलनी चाहिए. न्याय पाने का सबको एक समान अधिकार है अब जिस किसी सज्जन को मेरी इस बात से ऐतराज हो वे लोग भी अपने तर्क और विचारों से अवगत कराएँ और जिन्हें पसंद हो वे भी अपना समर्थन देने का कष्ट कराएँ धन्यवाद.

Writer – Arjun Prasad

Manoguru

Hey...! My name is Abhishek Tripathi and pen name "Manoguru". Thanks a lot to be a member of my life by my these startups. I hope that you are easily understand me and my aim to change something in everyone. You know that -" Nobody can do everything but Everybody can do something". so activate your inner powers, talent, sensitivity , sincerity etc. Be a helping human... keep connected....... thanks again

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