जाग जाओ नहीं तो पछताओगे- “बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा”

माँ की ममता  – कवि  बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु) 

जिसने मुझको जनम दिया, उस माॅ को मैं भुलूॅ कैसे
अपने कर्म का फल है भाई, अपने कर्म को भुलूॅ कैसे ।।

माॅ की आॅचल के नीचे हम, कितना सकुन पा लेते हैं
ममता की देवी अपनी है माता, उनके चरण छु लेते हैं ।
माॅ के दिल में दर्द है होता, जब बच्चे को कुछ होता है
बच्चा भी है रहता पूत जब तक, जब वो सपूत होता है ।
सागर से क्या कम है माता, उस माॅ को मैं भुलूॅ कैसे
भूखे रहकर मुझे खिलाई, उस माता को मैं भुलूॅ कैसे ।।

नौ माह तक गर्भ में जिसने, कितनी पिड़ायें दर्द सहे
जन्म हुआ तब लाल देखकर, हाय रामा, उफ् भी न कहे ।
वह टुकड़ा कलेजे का जब, आॅख के आगे आ ही गया
इससे बढ़कर क्या होगा, जीने का सहारा मिल ही गया ।
जिसने हूनर दी है मुझको, उस माॅ को मैं भुलूॅ कैसे
राह दिखाई बचपन सींचा, उस माता को भुलूॅ कैसे ।।

जो माॅगा सब उसने दिया है, पूरा तो उसने ही किया है
सबकुछ अपना देकर उसने, नाम अपने कुछ न किया है ।
एक तड़प माॅ मन मे रखती, दूर न जाए बस नजरों से
थोड़ी सी जो चोट लगे तो, टीस सी उठती अधरों में ।
जिसने चलना मुझे सिखाया, उस माॅ को मैं भुलूॅ कैसे
जिसने हॅसना मुझे सिखाया, सचमुच उनको भुलूॅ कैसे ।।

 

कवि – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

 

जाग जाओ जनता नहीं तो पछताओगे 
बाहुबली नेता को जो चुनकर लाओगे ।
हक जो दिला सके वही तो तेरा नेता है 
ख्याल गरीबों का जो घूस नहीं लेता है ।
उसे पहचान लो जो काम तेरा आयेगा
संकट जब पडे तो वो तुमको बचायेगा ।
चमक धमक पोस्टर परचार नहीं चाहिये
मानवता हनन वो तलवार नहीं चाहिये ।
शहर गाॅव बस्ती विकास जो करायेगा
ऐसा ही मसीहा एक चुनके जो लायेगा ।
नीति राजनीति में इंसाफ मांगता है अब
सांसद विधायक से हिसाब मांगता है अब ।
भोली भाली जनता को ठगे हैं बहुत सब
सो रहे थे पहले अब जगे हैं बहुत सब ।
कर्णधार वही है जो वादा को निभायेगा
काम कुछ करेगा कुछ कर के दिखायेगा ।
संसद संविधान है निदान सारे जड़ का
अपना हिन्दुस्तान टूकड़ा एक धड़ का ।

 

कवि – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

 

इश्क में छुप छुपाई कब तक
रिक्स में बाय बाय कब तक ।।

डरना अब क्या इस जमाने से
कौन बच पाया भला निशाने से ।
जीवन की पटरी में रेल बन जाओ
बाती जलती रहेगी तेल बन जाओ ।
इस तरह जग हंसाई कब तक
रिक्स में बाय बाय कब तक ।।

बिन पैसे की शादी कोर्ट में जाओ
सैर करने अब एयरपोर्ट में जाओ ।
अपने दम पर कुछ कर दिखाओ
शान से फिर घर लौटकर आओ ।
हिन्दु मुस्लिम सिख इसाई कब तक
रिक्स में बाय बाय कब तक ।।

बोझ न बनना कभी किसी का
खोज न बनना कभी किसी का ।
जीना है तो अब घुल मिल जाओ
फूल चमन सा तुम खिल जाओ ।
तडप मिलन दुख दुखाई कब तक
रिक्स में बाय बाय कब तक ।।

ऐसा कुछ भी काम न करना
अपने को बदनाम न करना ।
एक पतंग एक डोर बन जाओ
चाॅदनी का चकोर बन जाओ ।
प्यार में अब जुदाई कब तक
रिक्स में बाय बाय कब तक ।।

 

कवि – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

 

सावधान ! खामोश !!
मैं अकाशवाणी हूॅ।
अपना हाथ मुझे दे दो
यह जोर की अवाज थी
चौकन्ना बन कर वह देखता रहा
बोला ! तुम कौन हो?
तभी आवाज आई
मैं इंसाफ हूॅ।
तूनें अपने इन हाथों से
बडे़ अधर्म और पाप किये हैं
इसकी सजा मिलेगी
मैं तुम्हारा हाथ काटकर
दवा दूगाॅ तेरा गला
वह घबराया !
पसीने से तर वतर
घिघ्घी सी बंध गई उसकी
फिर भी मुहॅ खोला
बोला ! ऐसा मैंने क्या किया है?
अवाज आई ! अरे नादान
तूनें मर्यादा के
हर बंधन को तोड़ा है।
तेरे हाथ खून से रंगे है
तूने अपहरण
लूट मार किया है।
मैं इंसाफ करता हूॅ
अब मैं तुम्हें प्राण दण्ड़ दूगाॅ
छह फुट का जवान मर्द
अवाज सुनते हिल गया
सर्द सा बनकर रह गया।
थरथराहट से उसका कलेजा मुंह को आ गया
मृत्यु को पास देख वह घबराया
धीमी आवाज में बोला
मुझे छोड़ दो !मेरे प्राण बख्स दो!!
मैंने क्या विगाड़ा है आपका
मैं अपने सारे बुरे करम छोड़ दूगाॅ
आपके शरण में हूॅ
माफ कर दो मुझे।
अरे मुरख!
तेरे जैसे लोग
कलंक है दुनिया के लिए।
घर.गाॅव.शहर.बस्ती
देश.परदेश
सबके लिए तुम बेकार हो।
तेरा मरना जरूरी है
तेरे जैसे को
चुन.चुनकर मारने आया हूॅ।
वह बेहोश होकर गिरा
फिर से कभी होश न आया
मेरा संदेश इस देश के लिए
अच्छा बनो अच्छा रहो
एक इंसान बनकर इंसाफ करो।
मैं इंसाफ हॅू
भलाई और खैर चाहता हूॅ
कर्म को प्रधान बनाओं
विश्वास करो
सबका भला होगा।

कवि – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

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