गर तुम पढ़ लेती

बात बेबात ऐसे न सताओ उनको जख्म दो पर ऐसे न भुलाओ उनको ये जो आखों में रखे है मोती थोड़े ये अमानत है ऐसे न लुटाओ उनको बातो बातो मे ऐसे न बहलाओ उनको जरा सी बात है थोड़ा सा मनाओ उनको वो मान जाएगें ऐसी तो कोई बात नही ये तो अपने है ऐसे न रूलाओ उनको – आशुतोष पाण्डेय शब्द सा तुम बनी, अर्थ मै हो गया। आत्मा तुम बनी, देह मै…

"गर तुम पढ़ लेती"

हाँ “योगी” बहरुपिया है…

मैं बहरुपिया बन जाता हूँ कभी शराब तो कभी दुआ बन जाता हूँ , मैं यूँ करता हूँ कि अब बहरुपिया बन जाता हूँ… उसके बेचैन होठ लब-ए-लिखावट की शिकायत करते हैं सो करीब आकर उन साँसों का काफिया बन जाता हूँ… मैं जिस्मों तक रूह की खबर ले जाने लगा हूँ , कभी शायर तो कभी डाकिया बन जाता हूँ…. उसके कई ख्वाब मेरे हकीकत से होकर गुजरते हैं, सो कभी कातिल तो कभी…

"हाँ “योगी” बहरुपिया है…"

“वो गज़ल और हम”- राहुल कुमार (लेखक)

आज आख़री दफ़ा तन्हा हुवे हैं हम, पहली दफ़ा ग़ालिब समझ मे आये। ……..राहुल कुमार लिए हस्ती अपनी जब गुमनाम से मिलते हैं, अब मेरे लोग भी मुझको तेरे नाम से मिलते है। मग़रूर हो तुम भी तो हमे भी कोई जल्दी नही, चलो तो फिर तुमसे कभी आराम से मिलते हैं। …….राहुल कुमार रफ़ीक सारे अपने दुनिया-दारी में लगे हैं, हम बेवक़्क़त अब भी शायरी में लगे हैं। आफ़ताब को पहली दफ़ा सक हुवा…

"“वो गज़ल और हम”- राहुल कुमार (लेखक)"

“तुम नहीं समझोगे” – मीरा श्रीवास्तव (गुरू माँ)

—– “तुम नहीं समझोगे” —– महलों में रहने वालों तुम क्या समझोगे जज्बातों को क्या समझोगे रिश्ते नातों को क्या समझोगे दुखियारी के रूनदन को क्या समझोगे अन्तर मन की वेदना को क्या समझोगे गरीब की लाचारी को क्या समझोगे मध्यम श्रेणी की पीड़ा को क्या समझोगे दुनियादारी को, क्या समझोगे ममता के बन्धन को महलों में रहने वाले सोने की चमक से चमक रहे नींव की ईंट की पीड़ा तुम क्यों नहीं समझ रहे…

"“तुम नहीं समझोगे” – मीरा श्रीवास्तव (गुरू माँ)"

“मैं तुम और हम” —कवि अंकित

मैं तुम और हम” मैं डूबा तेरी आँखों में ,आँखों में मेरे पानी है….. कुछ उलझी , कुछ उलझन सुलझी अपनी एक कहानी है…. तेरे होंठों पे नाम जो आया, थोड़ा सा मुस्कराया…. रिश्तों को जरा सँजोए रखो , मौत तो हमको आनी है….. मेरे सपने कुछ हैं टूटे , कुछ तुमसे हैं जुड़े हुए …. जीवन के कुछ पन्ने अब भी हैं, थोड़े से मुड़े हुए…. मैं तुझसे पूरा होता हूँ , तू मुझमें…

"“मैं तुम और हम” —कवि अंकित"

महफिल – ए – शायरी ( 2 )

– मनोगुरू + Shailendra verma(Shayar) Shailendr verma (शायर) ↓ अाते आते आएगा दिल को करार जाते जाते ही बेकरारी जाएगी मनोगुरू(Dark.Days.Diary) ↓ ये खुमार-ए-इश्क है साहब…! अब शायद ना बीमारी जाएगी, कहते हो…! तो करता हूँ चैन से करार पर वक्त रहते बेकरारी तो जाएगी हूँ जमीं पे, तब तलक शायरबाजी ही भाएगी   – मनोगुरू + @sakshi jain @Sakshi jain ↓ तूफान है मेरे अन्दर , बुझने दूँ कैसे भला….. + मनोगुरू @dark days…

"महफिल – ए – शायरी ( 2 )"

“जिद जुनून जीत” — मनोगुरू

गिन मत कदम मंजिल से पहले, वो खुद शुमार होंगे तेरी जश्न-ए-फतह में…. -अभिषेक “मनोगुरू” Collab with = Shiwam pathaur + Sharda Khakre + मनोगुरू (Dark Days Diary)…… on your quote app. वो चिराग दीपक समझ , बुझता सा दिख रहा है पर वो सिरफिरा बेफिक्र हो, तकदीर लिख रहा है… अभिषेक “मनोगुरू” थी हमारी भी तमन्ना आसमान छूने की, पर काट लोगों ने ज़मीन में दफ़नाया अतुल हिन्दुस्तानी जो कर प्रयास बेधुंध आसमां छू…

"“जिद जुनून जीत” — मनोगुरू"