Rohit Rathore (Winner of H.M.D.)

एक कविता माँ को समर्पित, छात्रावासियों को समर्पित। माँ मुझे तेरी याद आती है।  जिन्दगी जब भी सताती है। माँ मुझे तेरी याद आती है। भूख हद से मचल जाती है, जब रसोई में उंगली जल जाती है, तू फूँक को कैसे मरहम बनाती है,  माँ मुझे तेरी याद आती है। रात किताबों में जब ढल जाती है, नींद आँख में ही जल जाती है।  कोई माँ जब कहीं लोरी सुनाती है, माँ मुझे तेरी…

"Rohit Rathore (Winner of H.M.D.)"

“तुम नहीं समझोगे” – मीरा श्रीवास्तव (गुरू माँ)

—– “तुम नहीं समझोगे” —– महलों में रहने वालों तुम क्या समझोगे जज्बातों को क्या समझोगे रिश्ते नातों को क्या समझोगे दुखियारी के रूनदन को क्या समझोगे अन्तर मन की वेदना को क्या समझोगे गरीब की लाचारी को क्या समझोगे मध्यम श्रेणी की पीड़ा को क्या समझोगे दुनियादारी को, क्या समझोगे ममता के बन्धन को महलों में रहने वाले सोने की चमक से चमक रहे नींव की ईंट की पीड़ा तुम क्यों नहीं समझ रहे…

"“तुम नहीं समझोगे” – मीरा श्रीवास्तव (गुरू माँ)"

“जल का तांडव”- मनोगुरू

“जल का तांडव” सैलाब के सितम ने देखो , आशियानों को डुबाया है…. जी रहे परिवार कोे संग , जीते जी ही बहाया है….. आपदा का स्वरूप धर यूँ , जल ने तांडव दिखाया है…… अब कष्टरूपी बारिश में देखो, जीवन कैसे नहाया है….. तन,धन,जन,अन्न भी , जल की जलन ने जलाया है…. खुशनुमा था हाल सबका , उनको भूखा रुलाया है …. सैलाब के सितम ने देखो , अरमानों को ढहाया है , बैर…

"“जल का तांडव”- मनोगुरू"

“वो बे-गुनाह थी”- मनोगुरू

1.↓ “वो बे-परवाह शख्स” ↓ जूझ बैठा आज मन , बस ख्वाब में उस शख्स से पूछ बैठा आज सुन , शीशे में अपने अश्क से…. बेवक्त ही क्या वक्त माँगा …? सिरफिरे कम्बख्त ने…… वक्त था पर ना दिया, उस दिल-ए-सख्त ने…… वक्त भी बे-वक्त बोला, माँगा ही क्यूँ उस शख्स से…? सख्त था जो ना दिया, उस दिल-ए-कम्बख्त ने…… सूझ बैठा आज क्यूँ , जूझने को अश्क से पूछ बैठा आज क्यूँ ,…

"“वो बे-गुनाह थी”- मनोगुरू"

“तेरा ना होना बेहतर है” – मनोगुरु

वो थी तब खुश था वो थी तब खुश था, जो अब नाखुश है…. .वो थी सब कुछ था, जो अब ना कुछ है…. .‘वो’ और ‘मैं’ तब “हम” थे , जो अब ना हम हैं… .वो थी गम कम थे , जो अब गम नम हैं…. वो साथ थी , तब दम था… जो बात भी , अब कम है.. .बेशक दूरियाँ हैं , औ गम हैं पर आज भी हम , “हम” हैं……

"“तेरा ना होना बेहतर है” – मनोगुरु"

सिर्फ तुम “मेरी माँ”— मनोगुरू

Only for you माँ….. ये चंद पंक्तियाँ उसको भी, जिसने हम सबको जन्म दिया | सहकर उस गहरी पीड़ा को, कर पालन पोषण बड़ा किया | इस माँ की महिमा है अपार , जिसका संरक्षण पाकर मैं जिया | नयनों , धड़कन में बस मैं हूँ , ख्वाबों , जीवन में बसता हूँ | हम पर उसके अरमान टिके, हाँ तभी मुझे बस वही दिखे | हो सुख या विपदा में साथ रहे , अपनी…

"सिर्फ तुम “मेरी माँ”— मनोगुरू"