ऐ आसिफा जग शर्मिंदा है !! Mo. Arshan

ऐ आसिफा जग शर्मिंदा है !! ऐ आसिफा जग शर्मिंदा है !! मंदिर जैसी पवित्र जगह को अपने इरादे की तरह नापाक कर दिया !! क्या तुम्हें पता भी तुम लोगो ने क्या पाप कर दिया !! एक बच्ची का इंसानियत से तुमने भरोसा उठा दिया !! हम सबका सिर शर्म से तुमने झुका दिया !! पापी बाहर घूम रहे सब कर रहे बस निंदा हैं ऐ आसिफा जग शर्मिंदा है !! ऐ आसिफा जग…

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वो मरती है , तो मरने दो – मनोगुरु

वो मरती है , तो मरने दो – मनोगुरु जो हो रहा है , होने दो कोई रो रहा है , रोने दो अरे सुना है …! कल कोई बेटी फिर से मरी है, खैर होता ये अब रोज , तो होने दो अरे सुना है…! देवस्थान पर भी कुछ हुआ था खैर होता है हर रोज , तो होने दो अरे सुना है …! आठ (8)साल की मासूम थी खैर आठ (8) महीने की…

"वो मरती है , तो मरने दो – मनोगुरु"

“यूं ही नहीं निकलते आंसू” – मीरा श्रीवास्तव (गुरू माँ)

यूं ही नहीं निकलते आंसू यूं ही नहीं टपकते आंसू। जब अपने धोखा देते हैं दिल पर चोट पहुंचाते हैं पीठ में खंजर घोप देते हैं , विश्वास तोड़ देते हैं जब होंठ कुछ नहीं कह पाते हैं तब अन्तर मन रो देता है , दिल से आह निकलती है तब दिल की पीड़ा ही आंसू बन बहने लगती हैं जो अपनापन रखतें हैं नम आंखों को पढ़ लेते हैं सारा दर्द समझ लेते हैं…

"“यूं ही नहीं निकलते आंसू” – मीरा श्रीवास्तव (गुरू माँ)"

“झुलसती भावना”— मनोगुरु

कलम का उकेरना शुरू कर रहा हूँ रश्मि के घर से ताकि आप भी रूबरू हो सकें उसके परिवार से और उस आँगन से जिसकी रश्मि ही रौनक थी | उस आँगन में रश्मि ने छन .- छन छनकती पायलों को बाँध पहला पग भी रखा था | किसी कोने में भाई-बहिन सहेलियों के साथ घर घर भी खेला तो उसी दहलीज पर बैठकर दादी माँ से बालों की चोटियाँ भी करवाई |छत पर बैठकर…

"“झुलसती भावना”— मनोगुरु"

Pratibha is Alive by manoguru

हर रोज की तरह आज भी दिन ही था रात के 12 बज़कर 51 मिनट पर भी, अरे इक अरसा बीत गया है मनोगुरु ने रात और दिन में फ़र्क नहीं समझा | वजह…? वजह यह है कि सुना है कभी – ” जब आप सो रहे होते हो तब भी कोई जाग रहा होता है और जब आप जागॉगे तो वो आप से कहीं गुना आगे होगा” | बस अब यही याद रख कर…

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दम तोड़ती शिक्षा – मनोगुरु

“दम तोड़ती शिक्षा” (मनोगुरु)   जिस्म मेरा क्यूँ छुआ , ज़िन्दगी थी क्या जुआ लुटती तेरी आबरू तो , यूँ नजारा देखता क्या   – मनोगुरु – हर रोज की तरह 19 तारीख की सुबह जब आंख खुली तो हल्की सी मुस्कान के साथ बिस्तर को अलविदा किया और जाकर आंगन में रखी कुर्सी पर बैठ गया । अब चूँकि एक अलग दौर से गुजर रहा हूँ तो वक्त की अहमियत को दरकिनार भी नहीं…

"दम तोड़ती शिक्षा – मनोगुरु"

“मेरी इंदौर यात्रा” भाग-2 (मनोगुरु)

हाँ तो बात कहाँ तक पहुँची थी कि मैं उस इकलौते डिब्बे का कुमार विश्वास था मानो , फिर धीरे -धीरे सबने अपना-अपना हुनर दिखाना शुरू कर दिया |कोई हसा रहा था तो कोई मेरी ही तरह अपनी कविताओ को पेश करने लगा | तभी एक शख्स ने, अरे…! उम्मीदवार ने ही अपनी कलाकारी को मेरी नज़रो के सामने रख दिया , जिस पर मेरी निगाहे भी टिक गयी |नाम तो आज भी याद है…

"“मेरी इंदौर यात्रा” भाग-2 (मनोगुरु)"

“मेरी इंदौर यात्रा” भाग-१ (मनोगुरु)

दरअसल बात उन दिनों की है , जब मैं भी सरकारी नौकरी की परीक्षाओं के अग्निकुण्ड में गोते लगा रहा था | एक बार पुनः उसी सिलसिले मैं इंदौर की ओर रवाना हुआ लेकिन इस बार का सफ़र यादगार रहेगा इस बात का अंदाज़ा तो नही था। खैर वही हर बार की तरह मेरा कहना कि , ” कल देखा किसने” सो मैं भी बस मस्ताना सा चल दिया । लेकिन समस्या यह थी की…

"“मेरी इंदौर यात्रा” भाग-१ (मनोगुरु)"

“मनोगुरू”आ गया है

सोचता हूँ कि लिखना बन्द कर दूँ….. खुश मत हो मनोगुरू लिखेगा……हाँ लिखेगा.. कल जब दिखूँ कहीं मशहूर लेखकों की फेहरिस्त में तो ये मत कहना कि – “मुझे तो पता था कि वो लेखक बनेगा”। खैर कह देना कोई फर्क नहीं पड़ता अब क्यूँकि “समाज” को बचपन से “समझ” लिया है। मजा ही लेता है वो अपना कहा जाने वाला -“समाज” अरे कुछ को अंग्रेजी आती है ना तो उनको अवगत करा दूँ कि…

"“मनोगुरू”आ गया है"

“जल का तांडव”- मनोगुरू

“जल का तांडव” सैलाब के सितम ने देखो , आशियानों को डुबाया है…. जी रहे परिवार कोे संग , जीते जी ही बहाया है….. आपदा का स्वरूप धर यूँ , जल ने तांडव दिखाया है…… अब कष्टरूपी बारिश में देखो, जीवन कैसे नहाया है….. तन,धन,जन,अन्न भी , जल की जलन ने जलाया है…. खुशनुमा था हाल सबका , उनको भूखा रुलाया है …. सैलाब के सितम ने देखो , अरमानों को ढहाया है , बैर…

"“जल का तांडव”- मनोगुरू"

“नव्या”- एक खत तुम्हारे नाम Part 2— मनोगुरू

हाँ… तो बात कहाँ तक पहुँची थी, अरे याद आया । जन्मदिन तुम्हारा हो या फिर मेरा मगर एक दूसरे को सबसे पहले बधाई देने की होड़ सी लगती थी और हर बार शायद तुम ही जीती उस फर्ज को । खैर याद है ना तुम्हें काफी जिद करती थी तुम मुझसे बस एक गाना सुनने को कि-“बस एक बार सुना दो ना” दो आjतक मैंने सुनाया ही नहीं पर अब कभी-कभी जब तन्हाई कचोटती…

"“नव्या”- एक खत तुम्हारे नाम Part 2— मनोगुरू"