“काश कोई सुन लेता” part2 — मनोगुरू

कोई कह दो ना कि रहने भी दो अब , भला मेरा क्या कसूर। शायद यही कि ल़ड़की हूँ फिर भी बस करो बेहद दर्द हो रहा है तुम्हारे नुकीले बेरहम औजारों से । माना कि अभी इस लायक नहीं हुई कि अपनी कराहती और बिलखती आवाज को आपकी बे-रहम , बेदर्द भावनाओं को सुना सकूँ मगर तुम सब तो बाहर की दुनिया में हो क्या कभी कोई चोट लगी या कटे नहीं हो जो…

"“काश कोई सुन लेता” part2 — मनोगुरू"

“आस्था की अफीम” — मनोगुरू

कमी न थी , पर कमीन निकले जमीन थी , संग जमीर निगले आशाराम भी संग रामपाल, बदनाम राम रहीम निकले लग्जरी गाड़ियाँ , बहुतायत जमीन इन्सान हूँ खुद को कहते रहीम अन्जान ही लेते आस्था की अफीम हैवानी नियत , रॉकिंग जोग लिबास रग-रग बसता , शॉकिंग भोग विलास छोड़ दो जाना , इनकी दुकान ना हैं सन्यासी , ना हैं इन्सान बंद होगा हर दिन , इनका बाजार घाटे में होगा , उनका…

"“आस्था की अफीम” — मनोगुरू"

“माँ-बाप हैं , कोई बोझ नहीं” -मनोगुरू

माँ-बाप हैं , कोई बोझ नहीं अरमान देख उनके, सब कुछ लुटा दिया, सम्मान देखा उनका , ये सर ही झुका दिया… देखा जो गिरते उनको , हाथों से उठा दिया कोई कभी माँ-बाप ना उनका, कहकर रुला दिया अब हम उम्र की दहलीज पर, तो ख्यालों से गिरा दिया अभिषेक त्रिपाठी ‘मनोगुरू’ ↑….↓ + kavyana (Anamika) कम्बख्त वक्त का रुख देखो , बिन आस के हम जीते देखो…. हर साँस में बसता “वो” अब…

"“माँ-बाप हैं , कोई बोझ नहीं” -मनोगुरू"

“काश…! कोई सुन लेता ” by मनोगुरू

ये देखो कोई मेरे लिए लिख रहा है , और मैं हूँ कि उसे देख ही नहीं पा रही कि आखिर मुझे लिखने वाला दिखता कैसा है। अरे…! तुमने भी नहीं पहचाना ? अरे मैं तो माँ की कोख में हूँ अभी इसीलिए किसी को नहीं देख पा रही । कोई बात नहीं , कुछ दिनों की ही बात है फिर कोख से बाहर आकर देखूंगी कि कैसी है ये बाहर की दुनिया और मेरे…

"“काश…! कोई सुन लेता ” by मनोगुरू"

“नव्या”- एक खत तुम्हारे नाम (manoguru)

यह खत जो मैं तुम्हारे साथ बीते उन यादगार पलों को दोहराते हुए लिख रहा हूँ , शायद तुम्हारी उन नजरों से ओझल ही रहे जिन्हें देखकर मैं कभी अनकही बातों को बड़ी आसानी से परख लेता था। खैर वो अलग बात है पर तुम्हें याद तो होगा ही कि मुझे तुम्हारे इर्द-गिर्द काफी चक्कर लगाने पड़े थे बस एक ‘हाँ’ सुनने थी ।और काफी कोशिशों के बाद मन मुताबिक जवाब मिला तो वो कहावत…

"“नव्या”- एक खत तुम्हारे नाम (manoguru)"

“वो गरीब की झोपड़ी” – मनोगुरु

शहर के एक कोने में कदमों के पास लेकिन नजरों से कोसों दूर गरीबी की धुंध में दबी सी, शायद तभी दिन हो या रात वहाँ मंजर समान ही रहता है । मगर इंसान की हसरत की तरह उसकी फितरत जो नहीं बदलती है । जहाँ शोरगुल का माहौल होते हुए भी शोर ही गुल था , शायद शोर भी उस दहलीज तक पहुँचते ही दम सा तोड़ देता हो। वहाँ से शहर और वो…

"“वो गरीब की झोपड़ी” – मनोगुरु"

वो आज भी जिंदा हैं…- manoguru

उस गाँव में वो हरे-भरे पेड़ , चहचहाते पक्षी , कोलाहल करती कहीं बच्चों तो कहीं युवाओं की टोलियाँ , वहीं नुक्कड़ पर बुजुर्गों की गपशप वाली चर्चाएँ तो कहीं खेत की ओर जाते किसान… और भी बहुत कुछ मानो संसार का हर द्रश्य एक ही जगह बसता हो । कढी़ मेहनत और उम्मीद का दामन थामे हर परिवार खुशियों से जीवन व्यतीत कर रहा था। क्यूँकि यहाँ ना तो वो शहर वाली पानी की…

"वो आज भी जिंदा हैं…- manoguru"