Kingfisher And Wild life Photography

एक दिलचस्प वाक़िआ-
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किंगफ़िशर नाम की इस चिड़िया का यह परफ़ेक्ट शॉट लिया है वाइल्ड लाइफ़ फोटो ग्राफर ‘एलन मॅक फ़ेडिन’ ने.
जी किंगफ़िशर वही किंगफ़िशर जिसकी तस्वीर आपने बियर की बोतल और हवाई जहाज़ में बनी देखी होगी. वही किंगफ़िशर जिसका मालिक देश को चकमा देकर लगभग नौ हज़ार करोड़ रुपये लूट के भाग गया. दरअस्ल ये चिड़िया भी विजय माल्या की ही तरह चालाक और शातिर है. किंगफ़िशर लगभग गोली की रफ़्तार से पानी में डाइव करती (डुबकी लगाती?) है.

मछली का शिकार करती है और उड़ जाती है लिहाज़ा आप समझ सकते हैं कि इस रफ़्तार से पानी में चोंच मारने वाली चिड़िया को उस वक़्त कैप्चर करना कि उसकी चोंच पानी को बस छूने ही वाली हो यानि छू तो चुकी हो लेकिन पानी में कोई हरकत न हुई हो मतलब चोंच का अक्स भी सौ फ़ीसद क्लियर हो, कितना मुश्किल और अक्सर लोगों के लिए लगभग नामुमकिन काम है तब और भी कि जब फ़ीमेल किंगफ़िशर को डाइव करते हुए कैप्चर करना हो क्यों कि फ़ीमेल किंगफ़िशर शायद कभी ही पानी में डाइव करती है. इसीलिए मैंने कहा दिलचस्प वाक़िआ. दरअस्ल सिर्फ़ इस एक तस्वीर को कैप्चर करने के लिए फोटोग्राफर ने लगातार छह साल कोशिश करते हुए अपनी ज़िन्दगी के ‘चार हज़ार आठ सौ’ घंटे ख़र्च किये और पूरे ‘सात लाख बीस हज़ार’ क्लिक के बाद उसे यह परफ़ेक्ट शॉट हासिल हो पाया. ऐसा नहीं है कि इस दरमियान उसने जो भी तस्वीरें लीं वो अच्छी नहीं थीं लेकिन मेरा ख़याल है कि यह एक तस्वीर उसको अमर करने के लिए काफ़ी है.
और आपसे बस तीन बार कह दिया जाये कि शे’र अच्छा नहीं है तो आपका मेसेज ही आना बंद हो जाता है. यानि आप हौसला हार जाते हैं. आर यू गेटिंग इट?
___फ़ैयाज़________

Writer’s Profile :- Dheerendra Singh (फ़ैयाज़)

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फ़ेसबुक ने एक जगह जहाँ हिन्दी- उर्दू को एक अच्छा प्लेटफ़ॉर्म दिया वहीं इन भाषाओं के बख़िये भी रोज़ यहीं उधेड़े जाते हैं. एक बात ग़ौर करने की ये भी है कि यहाँ बने- बनाये शाइर को तो ख़ूब फ़ैज़ हासिल हुआ कि उन्हें मुशाइरे मिले, पहचान मिली, प्रशंसक मिले. हालाँकि इसमें भी कोई दो-राए नहीं है कि यहाँ दोस्त- यार भी बहुत अच्छे- अच्छे मिल जाते हैं.
लेकिन ! यहाँ नयी नस्ल (जिसमें इम्कानात भी हैं) काफ़ी बिगड़ भी रही है यानि कहा जाये तो चंद संजीदा लड़कों को दरकिनार करते हुए आलम यह है कि वो बस जैसे- तैसे एक शे’र कह लेना चाहते हैं (और एक तस्वीर भी DSLR वाला कोई मिल गया तो कहने ही क्या) और फ़ौरन से पेश्तर उसे फ़ेसबुक में पोस्ट कर देना चाहते हैं.
फिर वो गिनते हैं अपने लाइक्स और कमेंट्स. कुछ लोगों को बल्कि कई लोगों को मैंने ये करते भी देखा है कि वो फ़ेसबुक पर एक भी शे’र या किसी क़िस्म का कोई भी स्टेटस नहीं छोड़ते. हर जगह उनका कमेंट मिलेगा.
कोई कहेगा ‘आदमी गधा है’ वो कहेंगे ‘वाह ख़ूब’ कुछ कहेंगे ‘दुरुस्त फ़रमाया’. फिर चंद घंटों बाद कोई कहेगा ‘आदमी गधा नहीं है’ फिर वही कहेंगे ‘वाह ख़ूब’, ‘जी दुरुस्त फ़रमाया मुहतरम’. क्या हो रहा है ये सब? आप ये भी देखिये कि आजकल लफ़ंगई भी ज़ोरों पर है और ये सारे लड़के आपको वहाँ मौजूद मिलेंगे. बेहूदा नहीं बल्कि काफ़ी गिरे हुए स्टेटस पर भी इनके बाप की कई बार तो दादा की उम्र के लोग हौसला- अफ़ज़ाई करते मिल जायेंगे. ख़ैर ! ये उनका अपना मस’अला है मुझे क्या लेना- देना. अफ़सोस इस बात का है कि जो कहते हैं कि उन्हें शाइरी में अपना कुछ मक़ाम बनाना है वो लोग लाइक्स- कमेंट्स के मोह- माया में ऐसे फँस चुके हैं कि उन्होंने ख़ुद को वक़्त देना ही बंद कर दिया है और वो किसी तौर समझने को तैयार भी नहीं हैं. कुछ लोग दो- चार बहरें सीख- कर भारी बड़े उस्ताद बने हुए हैं जिन्होंने ग़ज़ल तो क्या शे’र तो क्या एक मिसरा भी ढंग का नहीं कहा होगा. इधर मुझसे सवाल किया ऐसा होता है क्या? और उधर जवाब मिलते ही किसी तीसरे के स्टेटस पर दे आये ज्ञान और जब सामने वाला कोई सवाल करता है तो फिर वापस मेरे ही पास आते हैं और मैं फिर जवाब दे देता हूँ और इस तरह से वो बराबर उस्ताद बने हुए (रहते) हैं.
उस्ताद से एक बात याद आयी कि लोग इस्लाह तो बारहा मुझसे (या किसी और से) कराते हैं लेकिन जब भी वो शे’र पोस्ट करते हैं तो उस्ताद- ए- मोहतरम के बाद नाम किसी और का ही लिखा मिलता है. ये भी हँसने ही की बात है.. हंसिये हा हा हा !
लड़को को चाहिए कि वो सीखें भले ही किसी से लेकिन उस्ताद- ए- मुहतरम के नाम में वज़्न होना चाहिए बल्कि वो एक मक़बूल- ओ- मशहूर हस्ती भी होनी चाहिए. यानि कि उनकी सौ ग़ज़लों में झक कोई और मराये और राहत इंदौरी साहब जैसा कोई एक मशहूर शाइर उनका एक मिसरा ठीक कर दे तो फ़ाइनली उनके उस्ताद हो जायेंगे राहत इंदौरी. इससे मुझको (या किसी को) फ़र्क़ तो कुछ नहीं पड़ता लेकिन इसमें आपका नुक़सान ये होता है कि जो भी संजीदा दोस्त, बुज़ुर्ग या मेरे जैसा ही कोई अगर वाक़ई आपको सिखाना चाहता है, वो इसीलिए ही फिर आपको नहीं सिखाता. और हाँ मैं इस ग़रज़ से क़तई ऐसा नहीं लिख रहा हूँ कि आप मुझे (या किसी को भी) उस्ताद कहें कि न कहें बस आप अपनी मानसिकता पर ग़ौर फ़रमायें.. और हो सके तो अपने असली उस्ताद से ही इस्लाह कराया करें. पचास लोगों से इस्लाह कराने से आख़िर में शे’र कुत्ता बन जाता है.
बड़े प्यार के साथ
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फ़ैयाज़

Writer’s Profile :- Dheerendra Singh (फ़ैयाज़)

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“मेरी इंदौर यात्रा” भाग-१ (मनोगुरु)

Manoguru

Hey...! My name is Abhishek Tripathi and pen name "Manoguru". Thanks a lot to be a member of my life by my these startups. I hope that you are easily understand me and my aim to change something in everyone. You know that -" Nobody can do everything but Everybody can do something". so activate your inner powers, talent, sensitivity , sincerity etc. Be a helping human... keep connected....... thanks again

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