— विदाई —(दिनकर राव दिनकर)

— विदाई —

बेटियाँ धन पराया मैं कैसे कहूँ
गम जुदाई का बेटी मैं कैसे सहूँ

फिक्र तेरी है मुझको तू सुन लाड़ली
मैं सजाता हूँ रश्मों की इक पालकी

है रिवाजों की दुनिया निभाना तुझे
जाके ससुराल तू भूल जाना मुझे

गुड्डे गुड़िया भी ले जा खिलौने तेरे
ले जा यादों के बचपन सलोने तेरे

माँ सिसकती है तू देख ले भर नज़र
छूटता जा रहा आज बाबुल का घर

देख भाई बिछड़ता हुआ इस घड़ी
देख सखियाँ सहेली बिलखती खड़ी

दे रहे है दुआएँ कदम मोड़ ले
अपने दामन से नाते नये जोड़ले

जिंदगी को निभाना बड़े प्यार से
जीत लेना तू दिल सबका व्यवहार से

बेटी तुझपे मुझे तो बड़ा नाज़ है
तेरे हाथों में दो कुल की फिर लाज है

दिनकर राव दिनकर

 

प्यार को हासिल ठिकाना चाहिए
बेतकल्लुफ अब जमाना चाहिए

तोड़कर दिवार नफरत की सभी
आज दिल से दिल मिलाना चाहिए

प्यार में पाकिज़गी जिंदा रहे
चाहतें ऐसी निभाना चाहिए

कुदरतन है इश्क मेरे खून में
हुश्न को भी आजमाना चाहिए

ये मुहब्बत दर्द भी तो दे जरा
जख्म दिल पे फिर पुराना चाहिए

हो नज़र का वार भी बेइंतहा
इश्क करने का बहाना चाहिए

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