तू इतना खुश कैसे है..? – दुष्यंत प्रबल तिवारी

तू इतना खुश कैसे है, इतना खुश भी कोई होता हैं क्या ?
आँसू भी खुशियों के आते, सच बतला कोई धोखा है क्या ?

सब के सब , सारे के सारे तारीफ तेरी क्यूँ करते है,
सारी कमियाँ छिपलाने वाला, कोई तेरे पास मुखोटा है क्या ?

और ग़म को दिल में जगह नहीं हैं, तो मेरी सारी खुशियाँ रख ले ,
रो-रो के दिल भर लेती हैं , इतना दिल तेरा छोटा हैं क्या ?

गलियों में भटकी हों खुशियाँ, तो ला हमको घर तक लाने दे
पर जाहिल इतना तो कह दे , तेरे भी दिल में कुछ-कुछ होता है क्या ?

दुष्यन्त

 

 

बहुत सोचने में नहीं पड़ा इस बार मैं,
जब बंजर जमीन के नीचे बीज उम्मीदों के दबा दिए।।
ऊपर आसमान को देखा तो केवल सूरज तेज था,
थोड़ा टूटा, रोया और फिर तमाम अरमान पसीने में बहा दिए।।

 दुष्यन्त 

 

 

 

मेरे शहर का एक खास किरदार है
इसकी हर गली में एक चाय-सुट्टा बार हैं।।1।

गुलाबी होंठो से उड़ते धुँए के छल्लो से,
कैसी ये फ़र्जी फेमनिज्म की फ़ुहार है ।।2।।

चाय के साथ सिगरेट का यूँ असर हैं,
मुँह पे छाले हैं और मिर्च की बहार हैं ।।3।।

शहर को चमका रहे हैं चश्मे की तरह बेहतर, मगर
मिला रहा जो गंदगी चश्में का चौकीदार है ।।4।।

हर बात पे फसे हैं कुछ ऐसे पेंच उनके ,
जो दे रिया हैं गालियां वो इनका रिश्तेदार हैं ।।5।।

मेरे शहर का एक खास किरदार है,
इसकी हर गली में एक चाय-सुट्टा बार हैं।।6।।

 

 

देखिये उसका हृदय दर्पण की तरह साफ़ हैं
बालो पे है शोभनी पारुल हैं या पलाश है।।1

अंक की जो अंकिती पढ़े उसे मनीषी भी
की देह की आमिष में है क्यूँ इंद्र भी दधीचि भी।।2

की नेत्र की परिधि है यूँ समां रहा आकाश हैं
की हिम के नीर से बुझी जो दामिनी की प्यास है।।3

मृषा नहीं , न मेदिनी पे क्लान्त सा उभार हैं
की ज्ञान शुन्य व्योम् हो, अमोघ वो विचार है।।4।।

शुद्ध शुभ्र् सोमनी, वो शेष प्रज्ञा धारिणी
वो कृष्ण रुपी कालिका वो मोहनी विचारणीय।।5।।

की अंकुरों से जो बनी धरा दिखे अनेक है
वो मातृ, भगनि, भार्या समस्त शक्ति एक है।।6।।

धर्म,अर्थ,काम,मोक्ष,वन्दित समस्त वेद हैं
देवता भी हीन हैं , की कितने तेरे भेद हैं ।।7।।

की नारी रूप ज्योत्सना पीयूष मानव मूल्य हो                                                                                                                                                     

सनाया हो,समूल्य हो, तुम सर्व शक्ति तुल्य हो।।8।।

ओत प्रोत जिससे हो के फैला ये प्रकाश है,
देखिये उसका हृदय दर्पण की तरह साफ़ हैं ।।9।।

👉अर्थ
पारुल और पलाश – फूल
आमिष – मोह , भोगने की इच्छा
मृषा – झूठ
मेदनी – धरती
क्लान्त – ढीला
व्योम् – आकाश
अमोघ – अचूक , त्रुटिहीन 
ज्योत्सना – किरण का फ़ैलाव

Writer – Dushyant Prabal Tiwari

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Manoguru

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