हाँ मैं “अशांत” हूँ……(इंदौर)

जिसे दुत्कार खुद से मिल रहा क्या आस औरों की ,
झुका जब शीश ही , औकात क्या है शेष पैरों की ,
बड़ी उलझन भरी है ज़िंदगी , उसकी कहानी भी ,
न अपनों ने मुझे समझा , करूँ क्या बात गैरों की !

अशांत . (इंदौर )

भरे उत्साह में अर्थी बड़ी गमगीन लगती है ,
बिना अपराध की कोई सजा संगीन लगती है ,
भले हो दिन उजाले से भरा पर कुछ नहीं उसमें,
अगर हो साथ साथी रात तब रंगीन लगती है !

अशांत (इंदौर )

तेरी यादें बरबस आकर
सपनों में मुझे सताती है ,
तस्वीर तुम्हारी भी मुझको
बीते दिन याद दिलाती है,
मैं अपना सुध -बुध खो देता
कुछ बढ़ जाती है आकुलता ,
जब मंद हवा छूकर तुझको
मेरी गलियों में आती है !

अशांत (इंदौर )

देखो क्या – क्या इस धरती पर घोर पाप होता है ,
वैभव से शैशव – हत्या का पाप दनुज धोता है ,
द्वेष , जलन , कटुता की ज्वाला , टूट चुकी मर्यादा ,
रोता है इंसान और भगवान यहाँ सोता है !

अशांत (इंदौर )

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