“मेरी इंदौर यात्रा” भाग-१ (मनोगुरु)

दरअसल बात उन दिनों की है , जब मैं भी सरकारी नौकरी की परीक्षाओं के अग्निकुण्ड में गोते लगा रहा था | एक बार पुनः उसी सिलसिले मैं इंदौर की ओर रवाना हुआ लेकिन इस बार का सफ़र यादगार रहेगा इस बात का अंदाज़ा तो नही था। खैर वही हर बार की तरह मेरा कहना कि , ” कल देखा किसने” सो मैं भी बस मस्ताना सा चल दिया । लेकिन समस्या यह थी की उस ओर रेलगाड़ी एक ही जाती थी जो मेरे यहाँ से नज़दीक तो थी पर मंज़िल कोसो दूर । मैं शौकिया और बहुत सारे मेरे जैसे ही पर वाकई नौकरी की लालसा में सवार हुए उस भीड़ से खचाखच बोगी में । होता ये है की उम्मीदवार के साथ घर परिवार की उम्मीदों का पुलिंदा सिर पर तब तक तो रहता ही है जब तक कहीं नौकरी मिल ना जाए। अरे रहने ही देता हूँ । ये दास्तान तो सबको पता ही होती है क्यूकी हर घर-पड़ोस में इन्हीं सपनो से झूझती ज़िंदगियाँ आप को आसानी से दिख ही जाती होंगी। अब सीधा रेलयात्रा पर ही आता हूँ जो कि आज तक भुला नहीं पा रहा हूँ।अब चूँकि एक गाड़ी और सवारी बहुत, तो हम सबको खड़े-खड़े ही बहत्तर सौ मिनटों से अधिक का सफ़र तय करना था . हाहहाहा …. बहत्तर सौ सुनकर चौंको मत दूभर पल ऐसे ही याद रहते हैं, सो गाड़ी तो भारी वजन उठा ही रही थी लेकिन दूरी का ख्याल भी कम भारी ना लग रहा था उस समय. अब भाई मेरा खोजी स्वभाव कहीं भी अपनी हरकतों के प्रदर्शन में कोताही नहीं करता सो मैंने भी सरसरी नज़र दौड़ाना शुरू किया ही था ,कि यहाँ तो सब परेशान ही नज़र आ रहे थे और हौरानी लाजमी भी है आखिर कोई कब तक खड़ा रह सकता है। मैने भी हाल ही में कलमकारी शुरू की थी , तो सोचा की इंदौर की ओर रुख़ है तो चलो इंदौरी जी ही बनने की कोशिश करूँ । थकान से बेहाल उन युवाओं के उदास चेहरों को अपनी ओर एक शेर से आकर्षित कर ही लिया ।कुछ ही पलो में थकान होते हुए भी उनके चेहरो पर सुकून की झलक देखने को मिलने लगी फिर तो शायरबाजी भी परवान चड़ने लगी। बोगी में भीड़ के बावजूद पसरा सन्नाटा कब वाह वाह में तब्दील हो गया पता ही नही चला. अब तो मानो कुमार विश्वास ही था मैं उस रेलगाड़ी के इकलौते डिब्बे का………………

शेष अगले भाग में

“मेरी इंदौर यात्रा” भाग-2 (मनोगुरु)

नज़्म औ गजल (रजत मिश्रा )

Manoguru

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