|| राम जन्म ।। – कार्य नंद पाठक (लेखक)

|| राम जन्म ।।

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आज मन में साध है,
रामजन्म की कथा,
कहकर सुनाऊं आपको।
त्रेता में हम जनमे नहीं,
आँखों देखा हाल यह।
मानस में हमने जो पढ़ी,
हम आप से जो कुछ सुनी,
वर्णन वही करना यहां।

महीना चैत का ही था,
समशीतोष्ण वातावरण था,
भूमि सुवासित थी।
महलों से निकली,,,,,
सोहरों की स्वर लहरियाँ,
मन को भी हरने लगी।
जो जहाँ था, व्यस्त था,
फुरसत में था एको नहीं।
खुशियाँ किसे कितना मिली?
किस रूप में वह व्यक्त की?
शब्द में वर्णन की क्षमता,,,,
मेरी कलम में है नहीं।
कोई धन लुटाता था वहाँ,
कोई अन्न लुटाता था वहाँ,
राजा स्वयं निज हाथ से,,,,,
रत्नों की थैली लुटाया था।
खो गई सुध-बुध सभी,
कोई होश में माता न थी।
कौन आया किस तरफ से ?
पूछता कोई नहीं ।
सब के सभी मदहोश था,
होश में कोई नही।
श्रीराम छवि को देखकर,,,
टक-टकी सी लग गई।
माताएँ सारी पालना,,,
पल एक भी छोड़े नहीं।
एक झलक को देखने,,,,,,
भीड़ थी उमड़ी वहीं।
और तो कोई और था,,,,
स्वयं शिव भुसुण्डी सूर्य तक,
डेरा दिया था डाल ही।
नर वेष धर सबके सभी,
घूमते थे हर घड़ी।
शिव और हनुमान ने,,,,,
जाकर दिखाया नाच भी।
कभी कौवा कभी मानव,,,,
भुसुण्डी धरा था वेष भी।
जो भी जहाँ था उस घड़ी,
उद्यम भिड़ाया था सभी।
जिसको जहाँ जैसे बना,,,,
श्रीराम का दर्शन किया।
काल का चक्का चलता रहा,
अपनी गति।
संस्कार सबके सभी ,
होता रहा था हर घड़ी।
भगवान की लीला अजब,
माताएँ सब स्तब्ध थी।
कोसती थी आपको,
लीला गजब आकर रची।
पग धरा श्रीराम ने,,,
भूमि पर आकर जिस घड़ी,
उचका वहाँ था रोटियां,,
काग ने श्रीराम से।
भ्रम जब उसको हुआ,,,
लीला दिखाया राम ने।
उसकी दशा को देखकर,,,,
श्रीराम ने आशीष दी।
वरदान भी उसको मिला,
जीवित रहा बहु काल ही।

Writer – Karya Nanda Pathak

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