जिन्दगी इम्तहां क्यूं लेती है – Kusum Chokhani

आसां तो नहीं जिन्दगी को जिन्दगी बना लेना।
हर मोड़ पर ये कड़े इम्तहां क्यूं लेती है,
हौसलें यूं बना ए मुसाफिर,,,
ये अपनों के लिए अपनों से ही हरा देती है।
जिद्द जो कर लो हर हालात से लडने की,
ये जिन्दगी जीना सीखा देती है।
कोई नहीं बदलता यहां किसी के लिए,,,,
ठोकरें जो लगी,
ये खुद को बदलना सीखा देती है।
सच है…
आसां तो नहीं जिन्दगी को जिन्दगी बना लेना…
कभी जो खुशी बिखरे दामन में,जाने क्यूं
ये आंखें अश्रुओं से भीगा देती है।
रंग जो बिखेरो गैरों के लिए,,
ये अपनों से ज्यादा उन्हें अपना बना देती है।
आसां तो नहीं जिन्दगी को जिन्दगी बना लेना
ये हर मोड़ पर कडे़ इम्तहां लेती है।।

Kusum Chokhani

कुछ इस तरह समझदार हुए तुम
अपनों को गिराना और
फिर तमाशा बनाना,
खिलाड़ी भी बने तो अपने जमीर
से खेलकर,
काश खुद से तो वफादार रह पाते तुम।।

Kusum Chokhani

इक अनकहा, कुछ अनसुना सा
वादा है हमारे दरम्यान
जो न तुमने कहा
न मैंने ही तुमसे किया,
न कोई बन्धन
न पाबन्दी
बस खुद से ही कह लिया
खुद से ही कर दिया
रमे है इक दूजे मे
और बसे रहेंगे यूं ही
तुझमें मै मुझमें तू
और सिर्फ तू…।
साक्षी मैं नहीं हमारा मन
रहेगा इन वादों का
इन इरादों का
ये सफर है जीवन
और मेरे अंत का।

Kusum Chokhani

सिलसिले जो चले तो चलते ही गये
जो ठहरे एक दफा ठहरते ही गये।
सुना है बहुत मंहगाई है….
वक्त की कीमत का अंदाजा न था
कुछ अपनों को अपना बनाने के लिए
हम तो वक्त यूं ही जाया करते गये
तो बस करते ही गये।

Kusum Chokhani

तारीफों से मुकम्मल जहां होता होगा,
खामीयां जो गिनाएंगे हम और संवर जायेंगें,
बातों से छलनी करने वालों की तादाद कम तो नहीं
हम मुस्कराकर खुशबू की तरह बिखर जायेंगे।।

Kusum Chokhani

उमर की ताजपोशी पे यूं मगरूर न हुआ करो,
खुदा की पेशगी में उम्र गुजारी नहीं सख्सियत बखशी जायेगी।

Kusum Chokhani

मुझे जिन्दगी की बहारों में नहीं,,
शामिल रखना हर बेवफा मौसम में मुझे।
मिटा दूं हर दर्द का मंजर न सही,
दोस्त अकेला छोड़ दूं ये मुमकिन भी नहीं।।

Kusum Chokhani

गर भूल सकते हो तो भूल जाना हमें,
न फिर याद करना न फिर याद आना।
आसान ही है यूं राह मोड़ लेना तो,
ये हुनर हमको भी सिखाना।

Kusum Chokhani

जो गुजरे हैं वो दिन बेशक फिर न आयेंगे
दिलों में जो उतरे हैं अक्श रुह का बनकर,,,
उनके साथ बिताए लम्हें ताउम्र याद आयेंगे।
रश्मे अदायगी है महज साल दर साल गुजरना,
मरके भी हम आपसे हर वाजिब रिश्ता निभायेंगे।
चंद गिले शिकवे गर हुए भी हो जाने अंजाने
दरख्वाश्त आप सबसे है यही भूलकर उन्हें यहीं यकीनन फिर से मुझे दिल से अपनायेगें।
नूतन वर्ष का आप सभी को हार्दिक अभिनन्दन।

Kusum Chokhani

अजीब सी शै है जिन्दगी भी,,
मौत के आगोश में ही मंजिल है जिसकी,
और फिर भी बड़े शौक से जीये जा रहे हैं हम,
बताये कोई ये भी कि फरेब है या हकीकत जिन्दगी।।

Kusum Chokhani

सच ही है कि हुनर मौहब्बत का कद्रदान नहीं होता।
बैसबब जमाने में कोई अपना अपना नहीं होता।
मिट जाते हैं स्याह रंगों के लिखे फसाने भी, यहां
दर्द लेकर खुशी दे ऐसा कोई दरियादिल नहीं होता।

Kusum Chokhani

खामख्वाह सी तमन्नाओं पर
पर्दा डाल दिया हमनें..
कदर जब जज्बात की न हुई,
फिक्र अरमान की क्या होगी।।
मायूस राह मोड लेने से नहीं,,,
हैरां हूं मै ये देख कर,
सलीका खूब है,संजीदगी से
दरकिनार कर जाने का।।

Kusum Chokhani

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2 thoughts on “जिन्दगी इम्तहां क्यूं लेती है – Kusum Chokhani

  1. मनोगुरु परिवार का तहेदिल से शुक्रिया। आपने मेरी कलम को एक नयी उड़ान दी और अपने परिवार में मुझे स्थान दिया। होंसला अफजाई के लिए बहुत बहुत आभार।

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