धर्म के नाम पर गुमराह – (मानस कुमार देव)-

– मानस कुमार देव –

 

बेखबर कब तक रहोगे जमाने से,

खुद में ही ऐसे कब तक सिमटे रहोगे,
खिड़कियां-दरवाजे खोलकर तो देखो,

तेरे दर पर भी दस्तक दे रहा है धुआं,
कब तलक खुद को छिपाये रखोगे,

जंजीर गुलामी की बढ़ती जा रही है,
इस बात को कब तलक समझ जाओगे,

द्वेष जो फैलाया जा रहा धर्म पर,
कब तलक आँखें बन्द करके चलते रहोगे,

गर अभी समझ जाते हो सारी बातें,
जान लेते हो सामने वाले की साजिशे,

करो फिर विरोध सामने वाले का अभी से,
खामोश मत रहा करो फिर हिंसा देखकर,

नापाक इरादे को तोड़ दो,
हमलोग सब एक ही है,

आज जोर-जोर से अभी,
सभी को तुम बोल दो।

– मानस कुमार देव

 

 

 

लहू अब दरिया बनकर बहने लगा है,
इंसानियत का भी दम घुटने लगा है,

मासूमों की चीत्कार सुनी नहीं जा रही है,
लाशों के ढे़र पर सभी ख्वाब संजोने लगे हैं,

कौन अब किससे फरियाद करे यहाँ,
सियासत के आँच में सभी जलने लगे हैं,

देखकर खौफनाक सा मंजर यहाँ का,
दिल अब बहुत घबराने सा लगा है,

अहाते में आकर जो हम बैठ गये हैं,
खुद के बुजदिली पर तरस आ रहा है।

– मानस कुमार देव

 

 

जड़ता में जो जकड़े हुये हो,
अँधेरे की ओर बढ़ रहे हो,

खामोश रहना अब छोड़ दो,
कुछ तो लब से बोल भी दो।

– मानस कुमार देव

 

 

धर्म के नाम पर हमेशा,
गुमराह होते रहते हैं सभी,

जातिवाद पर आपस में,
द्वेष भावना में बहते रहते हैं सभी,

सफेद धारियों के हाथ की कठपुतली,
यहाँ पर बनते रहे हैं सभी,

आईना गर दिखाओगे सच्चाई का,
तुझसे ही बैर रखने लगते हैं सभी

– मानस कुमार देव

 

ख्वाबों का आँखों में पलना,
ये भी जिन्दगी कहलाता है,

पूरा ना होना ख्वाहिशों का,
बदकिस्मती कहलाता है,

लाखों युवा जो भटक रहें हैं,
मंजिल की तलाश में दर-बदर,

ये भी मृगतृष्णा कहलाता है,
सपने जो हर कोई देखता है,

गर पूरा नहीं हो पा रहा हो तो,
बेचैनी का आलम कहलाता है।

– मानस कुमार देव

 

 

वक्त अजीब है तो,
हमलोग भी क्या कम है,

बस हौसला रख दोस्त,
कदम आगे फिर बढा़,

अपने हुनर को तराश कर,
अपने मंजिल को तू पा ले।

– मानस कुमार देव

Writer’s Profile :- मानस कुमार देव ( https://www.facebook.com/Kumar.sdlmanas93 )

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Courtesy :” manoguru “(  https://www.facebook.com/abhishekmanoguru/ )

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