“तुम नहीं समझोगे” – मीरा श्रीवास्तव (गुरू माँ)

—– “तुम नहीं समझोगे” —–

महलों में रहने वालों
तुम क्या समझोगे जज्बातों को

क्या समझोगे रिश्ते नातों को
क्या समझोगे दुखियारी के रूनदन को
क्या समझोगे अन्तर मन की वेदना को
क्या समझोगे गरीब की लाचारी को
क्या समझोगे मध्यम श्रेणी की पीड़ा को
क्या समझोगे दुनियादारी को, क्या समझोगे ममता के बन्धन को

महलों में रहने वाले सोने की चमक से चमक रहे
नींव की ईंट की पीड़ा तुम क्यों नहीं समझ रहे
नोटों की चमक ने तुमको अनधा बना दिया है
कैसे निभाये जातें हैं रिश्ते महलों वाले क्या समझेंगे,जाके सीखो किसी गरीब से रिश्तों की

परिभाषा क्या है। ???

जिसको भाई कह देते हैं चाहे ना बांधी राखी हो
साथ खड़ी बहना हरदम जब दुःख में उसका भाई हो
जिसको मान लिया बेटे सा चाहे कोख से ना जन्मा हो उसको भी ममता के आंचल में मां की तरह छुपा लेती है मां सी बनकर
संकट जब भी आयेगा उसकी ढाल बन जायेगी
नहीं अकेले छोड़ेगी हरदम साथ निभायेगी
महलों में रहने वालों तुम क्या समझोगे मध्यम श्रेणी के रिश्तों को।
महलों में रहने वालों छलना सिर्फ तुम्हें आता है
बिन स्वार्थ बिन पेसो के कोई रिश्ता नहीं भाता है । महलों में रहने वालों तुम क्या समझोगे मध्यम श्रेणी के रिश्तों को उनके अनूठे बन्धन को।

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Try to understand every feelings and emotions.

“मैं तुम और हम” —कवि अंकित

Manoguru

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