इंसां तुम्हीं को रास ना आया

मुफ़लिसी ही मिली हिस्से , निवाला कर्म का खाया
तेरी बस्ती का इंसां ये , नजर तेरी ही ना आया

नक्काशी की तेरे ही घर , मगर ना आशियाँ पाया,
वो काला आसमाँ छत पर , मैं रूखी नींद भी पाया

मजदूरी कहो या आस , दो रोटी की कह लो तुम
तुम्हारी ही ज़मीं जोती , क्यूँ हिस्से कर्ज़ ही आया

खदानें कोयले की थी , ये सोना खोद मैं लाया
वो रोशन अब मकां तेरा , अँधेरा घर में मैं पाया

मुफ़लिसी ही मिली हिस्से , निवाला कर्ज में खाया
तुम्हारी शक्ल सा इंसां ,तुम्हीं को रास ना आया

मनोगुरु

Manoguru

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