“मैं तुम और हम” —कवि अंकित

मैं तुम और हम”

मैं डूबा तेरी आँखों में ,आँखों में
मेरे पानी है…..
कुछ उलझी , कुछ उलझन
सुलझी अपनी एक कहानी है….
तेरे होंठों पे नाम जो आया,
थोड़ा सा मुस्कराया….
रिश्तों को जरा सँजोए रखो , मौत तो
हमको आनी है…..

मेरे सपने कुछ हैं टूटे , कुछ तुमसे
हैं जुड़े हुए ….
जीवन के कुछ पन्ने अब भी हैं,
थोड़े से मुड़े हुए….
मैं तुझसे पूरा होता हूँ , तू मुझमें
थोड़ा खोयी है….
तेरे लब की वो आह यूँ सुनके , आँखें
मेरी भी रोयी हैं….

तेरे संग देखे सपने को , हर बार
मैं सँजोता हूँ….
कलम कागज में तुमको लेकर , हर बारी
मैं खोता हूँ….
रोयी आँखें , टूटे सपने , कुछ गैरों के
कुछ हैं अपने….
तुझ संग पूरा करना चाहूँ , तेरे और
कुछ मेरे सपने….

कुछ तुम कहती , कुछ मैं कहता
कहासुनी होती रहती….
प्रेम में बहकर , कुछ बातें
अनसुनी होती रहती….
तू है मेरी , मैं हूँ तेरा , दुनिया को
यही बताता हूँ…..
तुझ पर लिखकर कुछ गजलों को
अक्सर गुनगुनाता हूँ…..

कहासुनी को माफी देना , रिश्तों में
होता रहता है…..
अकेले को साकी देना , मानो होता
रहता है…..
रूठो तुम हर बार मनाऊँ , प्रेम की यही
विरासत है…..
तुमको फिर हर बार रिझाऊँ , मानो होता
रहता है…..

इक नदी समन्दर में जाकर ,
कैसे मिल जाती है….
मानो कोई स्याही कागज पर ,
जैसे खिल जाती है….
इक पंछी बैठा डाली जो , वो भी
हल्की हिल जाती है…..
मानो सहसा आकर खुशियाँ ,
जैसे मुझमें मिल जाती हैं……

— अंकित त्रिपाठी ( युवा कवि)

लेखक की रचनाएँ पढ़ने के लिए आप उनसे इस लिंक के माध्यम से सम्पर्क कर सकते हैं …

धन्यवाद

– मनोगुरू परिवार (कला अमर है)

 

“तुम नहीं समझोगे” – मीरा श्रीवास्तव (गुरू माँ)

Manoguru

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