हाँ “योगी” बहरुपिया है…

मैं बहरुपिया बन जाता हूँ

कभी शराब तो कभी दुआ बन जाता हूँ ,
मैं यूँ करता हूँ कि अब बहरुपिया बन जाता हूँ…

उसके बेचैन होठ लब-ए-लिखावट की शिकायत करते हैं
सो करीब आकर उन साँसों का काफिया बन जाता हूँ…

मैं जिस्मों तक रूह की खबर ले जाने लगा हूँ ,
कभी शायर तो कभी डाकिया बन जाता हूँ….

उसके कई ख्वाब मेरे हकीकत से होकर गुजरते हैं,
सो कभी कातिल तो कभी लश्कर
कभी मैं माफिया बन जाता हूँ ….!

ये इश्क का मौसम मेरे वजूद को खतरा है – ” योगी “
यूँ करता हूँ कि अब मैं चिड़िया बन जाता हूँ….

कि मुझे भारी पड़ने लगा है हसी ज़ख्म बनकर ,
अब दर्द भी सुनाता हूँ तो मैं मजाकिया कहलाता हूँ….

खैर अब मैं ” योगी ” बहरुपिया ही बन जाता हूँ

– योगी सिद्धार्थ ठाकुर. (Mob : 7277283011)

हिज्र के रातों में कुछ मिनट मौत के ऊँगली पकर
नापाक सन्नाटे व् सफ्फाक अंधेरो में रेल के पटरियों पर चली हो कभी तुम .?
नफ़रत के गर्मियों में खुले जीने पे लटके चाँद को देखने से मना किया खुद को की ये तुम्हारे आँखों को ठंढा कर देंगे..?
रक़ीब के दामन पकड़ने में, शराबे इश्क पिने में
एहतियातन कभी झिझक हुई तुम्हे..?
कभी तोरी हर कसमे मेरी तरह,
बेवजह चली कभी मीलों,यादो के सफर में
जिन फ़ज़ाओं में हमारा इश्क़ महका था क्या उनके कानो में दिलो की सरगोशियां की कभी तुमने?
कभी बताया सबको मोहब्बत के इक़बाल
जवां हैं अब तलक
जबकि एजाज़ तो ये की हर अरमान बूढ़े होकर मरते चले गए हैं..?
दिल ए बंदिशों एतराज पर भी फेसबुक के तश्वीरों को बेवज़ह एकटक देख फिर नाराज हो कर सोई हो क्या तुम कभी..?
सपनो के क़ायदे ये की जिसको सोचते रहो उसके ताबीर हो जाते हैं पर मुद्दतों न सोचने पर भी किसी रोज सपनो में आया हूँ तुम्हारे..?
कभी ग़ज़ल तो कभी सांसों के क़ाफ़िये में शरीक हो उसे
नये आयाम देने की कोशिश हुई तुम्हारी..?
बेचैनीयो में अश्क़ो को थामने वाले आह जैसे हर्फों में कोई तसल्ली ढूंढी हो तुम् ?
“अपने हल्के नफरत को इस वजनी मुहब्बत से तौलो
कुछ ज़ौक़ पाओगी तुम”..!

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Writer : Yogi Siddhartha Thakur

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Courtesy : manoguru

“वो गज़ल और हम”- राहुल कुमार (लेखक)

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