“वो गरीब की झोपड़ी” – मनोगुरु

शहर के एक कोने में कदमों के पास लेकिन नजरों से कोसों दूर गरीबी की धुंध में दबी सी, शायद तभी दिन हो या रात वहाँ मंजर समान ही रहता है ।

मगर इंसान की हसरत की तरह उसकी फितरत जो नहीं बदलती है । जहाँ शोरगुल का माहौल होते हुए भी शोर ही गुल था , शायद शोर भी उस दहलीज तक पहुँचते ही दम सा तोड़ देता हो।
हाँ से शहर

और वो शहरी तो बेहद साफ दिखते हैं मगर सिर्फ दिखते ही थे – ” वही शायद ” । कभी कभी तो सदेह होता था , खुद पर तो कभी दादी की वो बचपन में कही बात पर कि -“हम सबको उस ऊपर वाले ने एक जैसा ही बनाया है और हम सब उसकी सन्तान हैं – ‘भगवान’।


फिर भला ये लकीरें , ये नजरिया आखिर खींचा किसने कि जहाँ एक ओर जीवन का हर पहलू है तो वहीं दूसरी ओर सिर्फ ‘जीवन’ उस गरीब ही सही लेकिन हूबहू हमारी ही तरह दिखने वाले इंसान का।


रईसी का नकाब पहने हुए था तभी रोशनी से जगमगातेे शहर में, मुफलिसी से सुलगती हुई “झोपड़ी” को इतना ही देख पाया ।

हाँ वही गरीब की झोपड़ी जहाँ अपनी ही तरह दिख रहा कोई इंसान ही रहता है और हाँ शायद कोई परिवार भी…….

Help the poors….

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Manoguru

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