“वो गरीब की झोपड़ी” – मनोगुरु

शहर के एक कोने में कदमों के पास लेकिन नजरों से कोसों दूर गरीबी की धुंध में दबी सी, शायद तभी दिन हो या रात वहाँ मंजर समान ही रहता है । मगर इंसान की हसरत की तरह उसकी फितरत जो नहीं बदलती है । जहाँ शोरगुल का माहौल होते हुए भी शोर ही गुल था , शायद शोर भी उस दहलीज तक पहुँचते ही दम सा तोड़ देता हो। वहाँ से शहर और वो … Continue reading “वो गरीब की झोपड़ी” – मनोगुरु