Modernisation

“रोटी”

माथे पर,
कड़क तडपता सूरज।
बदन की करता लाही ।
सूलगे हुए सपने संग,
झूलसाती गर्मी में ।
हवा के झोके से,
मिले हल्का सूकुन ।
फटा हुवा गमछा ,
पोछता सारा पसीना ।
छिटक कर हाथ से,
माथे की बूंदे ।
देखता एक बार,
सूरज की ओर ।
फिर,
पेड़ के निचे बैठकर ।
एक मजदुर,
खाता है रोटी,
तोड़कर एक एक कौर ।

प्रदीप सहारे
लोधिवली-पनवेल

“अाधुनिकता”

आधुनिकता के मोह में,
एैसे हम जकड़े की,
आधे से आधे हो गये,
अाज हमारे कपड़े ।
भरे कपड़े की थी,
संस्कृति हमारी ।
भरजरी पैठनी,
नौ वारी साडी ।
घाघरा चोली,
सलवार कमिज ।
धोती,पायजामा,
लुंगी पहने मामा ।
सुट बुट में सेठ,
लगता था अपटुडेट ।
धीरे धीरे सब जा रहा,
अब यह सुट ।
अजब गजब पहनने लगे,
हम कपडे उट-सूट ।
नव वारी बाद हुई,
नहीं है पैठनी भरजरी ।
साहबजी की मैडम पहने,
अब टू पीस कॉपेरी ।
कॉपेरी पहन कर,
लगे मॅडम प्यारी ।
आगे पीछे दुनियां देखे ,
चश्मा लगाकर सारी ।
भाईजी की,
धोती छुटी,लंगोट हुई गायब ।
पायजामा भी अब,
पैरों में जकडे ।
फाड दिया पायजामा,
बरमुडा दिया नाम ।
बरमुडा भी हो गया ,
अब पचास फिसद्दी।
पहनने लगे अब,
जांगे नुमा चड्डी ।
घुमते पहनकर,
रेल,बस,बाजार,
बाप और छोरे ।
देखने से लगे,
पुरे छिछोरे ।
आधुनिकता के मोह में,
एैसे हम जकडे,
अाधे से आधे हो गये,
आज हमारे कपडे ।

प्रदीप सहारे
लोधिवली- पनवेल

” दर्पण “

उसके पायल की छन् छन्,
सुमधूर कर देती घर आंगन ।
तुतलाते उसके बोल,
कानों में देते संगीत घोल ।
माँ,बाप की थी वह परी ।
सुंदर सी राजकुमारी ।
लगाती माथे पर,
काज़ल का टिका ।
ना लगे नज़र किसी की बुरी ।
सजी गुडिया सी,
रुकती एक क्षण ।
देखती फिर दर्पण ।
चलती थी अपने रास्ते ।
एकदिन किसी की,
पङी नज़र बुरी ।
टुटी हुई चूडिया,
बिखरी थी सारी ।
चिख चिख कर,
कह रही थी,
मजबुरीयां सारी ।
चहल पहल,
हो गयी,अब उसके लिए गौन,
फिर ना देखा उसने,
कभी भी दर्पण ।

@प्रदीप सहारे
लोधिवली-पनवेल

(मैंने यह कविता तीन साल पहले लिखी पर हर बार अभी अभी लिखी लगती ह्रै ।)

” हिंसा का दौर “

बापु ,
देता हूं, तुझे देश की ख़बर ၊
वैसे तो सब चल रहा बराबर ၊
आपका चश्मा भी,
हमने लिया सर आंखो पर ၊
नोटो से लेकर शौचालय तक,
सब जगह दिख रहा बराबर ၊
सब जगह हमने तेरी दुकान खोली,
सब लगा रहें अपने हिसाब से बोली ၊
लेकिन,
बापू तेरे ” अहिंसा” के वचन से,
“अ” जा रहा हैं विलुपता की ओर.
अहिंसा के देश में चल रहा,
हिंसा का दौर..
मोहल्ले के झगड़े,
नही लाते सड़को पर,
भूला देते है निरभया को,
मोमबत्तीया जलाकर.
लिखते है कहानी-किस्से,
नक्सली हिंसा पर.
शहीदो के नाम बढे,
देश की सीमा पर.
भूल जाऊ सब कुछ मगर,
नही भूल सकते,
गोधरा और मुजफ्फरनगर.
अब तो,
हरदिन पड़ रही इसमें भर ।
बापू तेरे देश में चल रहा…

बापु अब बदल रहा देश तेरा,
अब हम अदालत के आदेश पर ၊
मनाएंगे दुर्गा पुजा, दिवाली,दशहरा ၊
नारी से सुरक्षित है गाय हमारी ၊
जाती,धर्म है माँ हमारी ।
झंडे हरदिन रंग बदल रहें ၊
नही किसी का कीसी पर नियंत्रन ၊
जनतंत्र के नाम पर,
बापु तेरे देश में चल रहा…

निवेदन करता हूं,
बस एक बार आजा इस धरती पर ၊
तेरे अहिंसा के वचन से,
सब चुप हो जाएंगे ၊
या हिंसा से,
तुझे चुप कर देंगे ।
फिर घुमेंगे भूखे नंगे ।
लेकिन नहीं हटाएंगे,
धर्म,जात पात,मंदिर,मस्जिद,
शब्द से नज़र,
बापु तेरे देश में चल रहा..

Writer – प्रदीप सहारे

Writer’s Fb profile- https://www.facebook.com/pradeep.sahare.9

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Manoguru

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