तुम ऐैसे कैसे भगवान ?

तुम ऐैसे कैसे भगवान ?

भक्त जो आस्था से,
आते तुम्हारे द्वार ।
देखने ,सूनने कोई चमत्कार ।
देखने कोई साक्षात्कार ।
तेरा रूप देखकर होते धन्य ।
चरणस्पर्श कर,कमाते पूण्य ।
हम भी मानते है भगवान ।
लेकिन,
तेरे रूप में घुम रहे,
धरती पर कई इन्सान ।
जो बन बैठें है भगवान ।
और हम नादान,
,मानते है उन्हें भगवान ।
उनकी दुनिया है नीराली ।
सब कष्ट,दुःख,समस्या का समाधान।
उनका अपना है,अद्भूत तंत्र ।
जो पढ़ाते केवल एक मंत्र ।
उनकी भभूत,चरणाअमृत,
गंडा,तंत्र और मंत्र ।
सब है एक चमत्कार,
सब डाँक्टर दवा,दारू,
उसके सामने बेकार ।
हम बैठ़ते सामने उनके,
होकर लाचार ।
दिखाएं कोई चमत्कार ।
जाग उठता,
बाबा के अंदर का इन्सान।
काम,क्रोध,लोभ माया,
भक्तो से छुडाते,खुद अपनाते।
कर बैठते गलत काम ।
गलत काम का,गलत इल्जाम ।
धोखा ,फ़रेब ,आरोप प्रत्यारोप ।
कोर्ट में,
जीवन की भीख माँगता,
रोता बिलखता ।
इन्सान रूप में भगवान।
तुम ऐैसे कैसे भगवान?
@प्रदीप सहारे
लोधिवली-पनवेल

मजदूर

गांव के जमीनदार से,
होकर तंग ၊
हो गयी ईच्छा,
जीने की भंग ၊
होकर मज़बूर,
रामभाया आया ,
घर से दूर ၊
शहर में बन गया,
मजदूर ၊
कभी देखा,
चाय के कट्टे,
कभी देखा,
ईट के भट्टे ၊
लेकर छोटी,
सामान की गठरी,
दिखा कभी,
रेल की पटरी ၊
नहीं बनाई कभी,
खुद की खोली ,
बना दी सेठ की,
सुंदर हवेली ၊
खुद को रखकर बेहाल ၊
बना दिए बड़े बड़े मॉल ၊
पूंजीपति की पड़ी नज़र ।
ले गये उसे उठाकर ।
लोहे की भट्ठी पर,
तान कर सीना ၊
फटे हुए गमछे से,
पोछता रहा पसीना ၊
खुद रहा बेहाल,
सेठ हो गया माला माल ၊
मुनाफा कमाता गया सेठ,
खुद चढता रहा,
मंदी की भेट ၊
मंदी की भेट चढे,
लगने लगा ङर ၊
खुद का पेट ना,
भर पाए बराबर ၊
सोचा सेठ से,
मिलाए नज़र ၊
यहां भी हो गयी,
उसकी बंद बोली ၊
युनियन लीड़र ने,
भरलीअपनी झोली,
उसके पैर लगी,
बंदूक की गोली ၊
अभी भी,
रामभाया हैं मजबूर ၊
सब कहते हैं उसे,
लंगड़ा मजदूर ၊
सब कहते हैं उसे,
लंगड़ा मजदूर ၊


🎭 प्रदीप सहारे
झूनझुना -7016700769
FB-हास्य और व्यंग्य प्रदीप के संग

(पिछले माह जम्मू में आैर कल कुशीनगर में स्कूल बस दुर्घटना हुई )

बाबा बाबा ब्लैक शिप..

संसार की बगिया के,
सुंदर से फूल ।
तैयार होकर,
भगवान को याद किया,
निकले जाने स्कूल ।
पप्पा को हाय किया,
मम्मी को बाय ।
बस आयी स्कूल की,
बैठ़कर बस में,
मम्मी के आँखो से हुये ओझल ।
बस में बैठ़कर,
शुरु हुई ,
कविता की अंताक्षरी ।
कविता चल रही,
“बाबा बाबा ब्लॅकशिप,
हैव्ह यू ऐनी वुल ,
यस सर यस सर,
थ्री बँग्ज फुल ।”
बस चल रही थी,
रास्ते पर उङाती हुई धुल ।
वन फॉर दी मास्टर
अॅन्ड वन फॉर दी डेम ।
एक व्हेन चढे पहाडी,
दुजी पटरी पर खडी ।
दोनों के साथ किया,
भगवान ने अन्याय ।
कर दी उसने भूल,
तोड़ दिए सुंदर सी,
बगीया के फूल ।
घर में इंतजार कर रही मम्मी ।
सुना जब उमने,
नही रहा उसका ,
लिटिल सा बॉय ।
होने लगी,
आँसुओं की बारीश ।
पिटने लगी ,
छाती धाय धाय ।
घर हो गया ,
व्हेरी व्हेरी सॅड।
मम्मी के आँसु ,
पोछते,पोछते,
डॅडी हो गये मॅड ।
कह रहे दोनों,
हे मेरे रब्बा,
क्या ! हुई हमसे भूल ।
क्यों ?
तोड़ लिए हमारे ,
बगीया के कोमल से फूल ।
गुनगुनाते थे घर भर,
बाबा बाबा ब्लॅक शिप ,
हॅव यु ऐनी वुल ।


प्रदीप सहारे
लोधिवली- पनवेल

घमासान

नगरपालिका की बैठक में,
चल रही थी घमासान ।
झगड़म,झगड़ा,
धक्काबुक्की,हाथापाई ।
अध्यक्ष,
सब देख रहा था,
होकर परेशान ।
समझ नहीं पा रहा,
क्या करें निदान ।
फिर उसने,
रटा हुवा शब्द दोहराया ।
“शांति प्लीज “
थोडी शांति हुई तो,
अध्यक्ष बोले,
” बताओं श्रीमान,
काहें चल रहा घमासान “
एक महोदय बोले,
“बात यह है श्रीमान,
हमारे यहां हैं स्मशान ।
बरसों से पड़ा है खुला ।
ना कोई दरवाजा,
ना कोई दीवार ।
हम चाहते,
पालिका बनाएं,
उँची दीवारें,
आलीशान चबुतरा ।
उसपर लगाएं,
मारबल पाषाण ।
बस,
इतनी सी बात हैं श्रीमान ।
उस पर चल रहा ,
यह घमासान ।”
अध्यक्ष बोले,
” देखों श्रीमान ,
ना कोई समस्या हैं,
ना उसका समाधान ।
अब मुझे बताओं,
अपनी मर्जी से,
कोई अाता स्मशान ?
नहीं श्रीमान . .
तो बताओं,
स्मशान से,
कोई वापस जाता?
नहीं श्रीमान..
फिर काहें यह घमासान ?”
असल बात यही है श्रीमान,
ना कोई समस्या,
ना कोई समाधान ।
चल रहा बस्,
सदन से संसद तक,
घमासान ।
चल रहा बस…


प्रदीप सहारे
लोधिवली-पनवेल

सूनों भरत ..!

सूनों भरत,
शकुंतला के पुत्र ।
जरा बात हमारी ।
कही,
भटक तो नही रहा,
भारत राह तुम्हारा।
तेरे नाम से,
बना भारत हमारा ।
सारे जहाँ से अच्छा है,
भारत हमारा ।
गौरवशाली रहा,
इतिहास हमारा ।
सोने की चीड़िया,
भारत हमारा ।
अहिंसा गामी,
भगवान महाविर,बुध्द,
की जन्मभूमि ।
भूखे को रोटी ,
अंधे को लाटी
पत्थर पुजे जाते,
गीत में है अंगाई,
सूनकर हम सो जाते ।
गुरु के चरणों को,
पुजा में रखते ।
चरणाअमृत पी जाते ।
खुद को धन्य समझते ।
कश्मिर से कन्याकुमारी,
तक हरियाली ।
हरियाली में थी खुशहाली ।
अब,
चारों तरफ चल रहा,
हिंसा का दौर ।
भात भात कहे मर रहें,
गरिब की पोर ।
झूठ आैर मक्कारी का,
फैला है जाल ।
मालदार बन रहें,
और मालामाल ।
गुरु की छोडो,
अब रिश्तो में बन गयी दूरी ।
पता नहीं,
कौन कब, घोंप दे छुरी ।
अंधेरे में राह पुछने,
दिल घबराएं हमारा ।
सूनों भरत,
कही,
भटक तो नही गया,
भारत राह तुम्हारा।

लोधिवली_ पनवेल

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Manoguru

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