कविता कवि का धर्म है (कवि प्रमोद विषधर)

 

 

 

 

 

कविता कवि की जाति है कविता कवि का धर्म 
सर्व प्रथम कविता लिखे कवि का ये ही कर्म 

मोह लोभ को छोड़ कर बँधे प्रेम की डोर
मानवता के गीत हित स्वर गूँजें घन घोर 


काम वासना लिप्त जो करते प्रेम प्रचार
संस्कार का जगत में करते वह संघार

बदनामी का भय रहे होता नहि वह प्यार
प्रेम कभी चाहे नहीं बदले में आभार


प्रेम किया जाता नहीं हो जाता है मीत
सत्य प्रेम की है सदा जग में ये ही रीत

प्रमोद विषधर

 

दोस्त था पर दुश्मनी हम से निभाता वो रहा 
गलतियाँ खुद की , हमें दोषी बनाता वो रहा
 
ऑख को ऑसू न देगा सोचते थे हम कभी
दर्द के दरिया में हमको ही डुवोता वो रहा

देख कर जीता है हमको हम समझते थे यही
हम से लेकिन छुपा छुपा कर गुल खिलाता वो रहा

थी हमारी कोशिशें बदनाम हो जाये न वो
खुद हमें बदनाम करके
मुस्कराता वो रहा

मेरी चाहत थी कि उसके दिल में मेरी हो जगह
हाथ मेरे हाथ से अपना छुडाता वो रहा 

 

प्रमोद विषधर

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