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पिताजी भारतीय सेना में थे और इसलिए अक्सर उनका हर दो या तीन साल में ट्रांसफर होता रहता था. यूँ तो पिताजी ने बहुत से ट्रांसफर देखे थे मगर वह पहला ट्रांसफर जो मुझे धुँधला धुँधला सा याद है सिलिगुरी से पचमढ़ी हुआ था. तब मैं कक्षा चार में था . वक़्त आ गया था जब हमने सामान पैक करना शुरू कर दिया . पिताजी के किट-बैग से लेकर बिस्तर-बंद तक सबकी पैकिंग मे बहुत मज़ा आता था. वो बड़े बड़े काले बक्से जिनपे सफेद पेंट से फ़ौजी का नाम और रैंक लिखा जाता था, मेरे जहन में आज भी ताज़ा हैं. मुझे अच्छी तरह याद है कि सिलिगुड़ी का घर खाली करते वक़्त हमने काफ़ी सामान वहीं छोड़ दिया था. अक्सर कुछ टूटा फूटा ग़ैरज़रूरी सामान लोग छोड़ ही देते हैं और काम का सामान ही पैक करते हैं. ब्रासो की पुरानी बोतल, पिताजी के पुराने डी एम बूट, मेरी बहन के पुराने खिलौने, तीन-चार पुरानी सैनिक समाचार पत्रिका और ना जाने क्या क्या ? हमने बहुत सा सामान छोड़ दिया था.

सब सामान पैक करने के बाद पिताजी ने सारा छोड़ा हुआ ग़ैरज़रूरी सामान इकट्ठा किया और एक कबाड़ वाले को दे दिया. फिर मम्मी ने हमारे खाली हो चुके घर को अच्छी तरह से पानी से धोकर साफ किया. पिताजी को याद आया कि रसोईघर का एक नल कुछ दिनों से लीक कर रहा था. घर खाली करने से पहले पिताजी ने MES से किसी को बुला के वह नल भी ठीक करा लिया . पिताजी का यह सब करना मेरी समझ से बाहर था. मैं सोच रहा था कि जब हम ये घर खाली कर ही रहे हैं तो क्यों व्यर्थ में साफ सफाई और नल ठीक कराने में समय बर्बाद किया जाए? पिताजी से सवाल पूछने की मेरी हिम्मत तो नहीं हुई मगर यह सवाल मेरे मन में बार बार आ रहा था कि अब जब हमको उस घर में रहना ही नहीं है तो क्यों इतना सोचना. हमारे बाद जो आएगा वह कर ही लेगा यह सब काम!!!

खैर !! कुछ दिनों बाद हम पचमढ़ी पहुँच गये. जैसे ही मैं अपने नये घर (क्वॉर्टर) में घुसा, अचंभित रह गया. हमारा नया घर बिल्कुल साफ सुधरा और व्यवस्थित था. बल्ब, नल, स्विच बोर्ड सब अच्छी कंडीशन में थे. हमसे पहले वहाँ रहने वाले फ़ौजी ने भी वह घर छोड़ते वक़्त साफ सफाई का पूरा ध्यान रखा.

मुझे मेरे सवाल का जबाब मिल गया था. शायद हमारी फौज का अनुशासन हमको यह सिखाता है कि सरकारी घर खाली करने का सही तरीका कैसा होना चाहिए. फौज सिखाती है कि जब आप अपना सरकारी घर छोड़ें, तो इस प्रकार छोड़ें कि आपके बाद आने वाले को रहने के लिए घर मिले, खंडहर नहीं . मुझे जो बात कक्षा चार में समझ आ गई, काश वह बात हमारे नेताओं को मंत्री बनने के बाद समझ आ जाती.

राहुल मिश्रा

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Manoguru

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