दम तोड़ती शिक्षा – मनोगुरु

“दम तोड़ती शिक्षा” (मनोगुरु)   जिस्म मेरा क्यूँ छुआ , ज़िन्दगी थी क्या जुआ लुटती तेरी आबरू तो , यूँ नजारा देखता क्या   – मनोगुरु – हर रोज की तरह 19 तारीख की सुबह जब आंख खुली तो हल्की सी मुस्कान के साथ बिस्तर को अलविदा किया और जाकर आंगन में रखी कुर्सी पर बैठ गया । अब चूँकि एक अलग दौर से गुजर रहा हूँ तो वक्त की अहमियत को दरकिनार भी नहीं … Continue reading दम तोड़ती शिक्षा – मनोगुरु