Riya Swarnkar

लफ़्ज़ों में कुछ कह पाना उस रात में बेहद मुश्किल होगा,
जब सदियो से भटकते मुसाफिर के सामने घूंघट में छिपा उसका कारवां होगा।
बढ़ती धड़कने और माहौल में सन्नाटों का शोर होगा,
जब झुकी हुई नजरों का उठना और क़यामत का गिरना होगा।
कपकपाते हाथो से उसकी नरम हथेलियों का यूँ छूना होगा,
तब अंदर उमड़ता तूफान और बाहर खामोशियों का नजारा होगा।
कंगन, बेंदी,झुकमों का जब उसके बदन को अलविदा कहना होगा,
सिरह रही है रूह भी उसकी ये बढ़ती हुई सांसों से बयान होगा।
शर्मा कर खुद से ही जब,उसका खुद में खुद को समेटना होगा,
भर कर बाहों में उसे अपनी, तब उसे माथा उसका चूमना होगा।
उलझती गर्म सांसो में जब उलझना उसकी सांसों का होगा,
तब मिट रहे फसलों से करीब आते हुए लबों से लबों का मिलना होगा।
जन्मों की प्यास मिटाने को आज उन्हें अमृत हासिल होगा,
लफ़्ज़ों में कुछ कह पाना उस रात में बेहद मुश्किल होगा।
जब सदियो से भटकते मुसाफिर के सामने घूंघट में छिपा उसका कारवां होगा।

– रिया स्वर्णकार

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Manoguru

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