Sakshi Chauhan

दो वक़्त का खाना जुटाना
जिनके लिए बड़ा मुश्किल होता है…
चाहे जितनी कड़ी धूप हो या ठिठुरती ठंड,
उनके पास रहने को घर कहाँ होता है…

सपने तो ढेरों, आँखों मैं उनकी भी होते हैं,
पर साकार करने का साधन , उनके पास कहाँ होता है…
अपने बच्चों को अफ़सर बनाना वो भी चाहता है,
पर उसका ये सपना सिर्फ़ सपना बनकर रह जाता है…

कभी ढाबे में काम कर , कभी बड़े घरों में सफाई कर
कुच्छ ना कर पाने पर , भीख माँगता है मजबूर होकर
चेहरे पर खुशी आ जाती है उनके भरपेट खाना मिल जाने पर
हाँ ये सच है कि वो ग़रीब है,
पर इंसानियत उसमें सदैव ज़िंदा रहती है…
एक बार मदद करने से अमीर मना कर सकता है,
पर ग़रीब हर सुख-दुख में साथ खड़ा रह सकता है…

:- Sakshi Chauhan

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Manoguru

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