फिर भी दहेज जरूरी है (शैलेन्द्र वर्मा)

उम्र गुजारी हमने बेटी का दहेज जुटाने में,
ये कमर झुकती गई बच्चो को पढ़ाने मे।
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एक एक दिन गुजरता वेतन के इंतजार मे,
चप्पल घिस गयी जी.पी,एफ निकालने मे।
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सरकारी कर्मचारी सेहरा मक्कारी का सर पे हे…,
किसे बताएँ क्या सहा भष्टाचार से दामन बचाने मे
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आधी पगार तो इ.एम.आई मे चली जाती हे यारो,
झुरिया चेहरे पे आई खिचतान के घर चलाने मे…।
……..
रोज़ डाँट सुनते बोस कि लेट दफ्तर आने के लिए,
अब किसे कहते देर हुई बच्चे को स्कूल पहुचाने मे।
……..
अक्सर छुट्टी लेने को बिमारी का बहाना बनाते लोग,
मुझे घर का पहीया रूका दिखा बिमार हो जाने मे।
…….
“उज्जैनी” कहता हर शास. कर्मचारी मक्कार नही ,
कई घून पिस जाते हे अक्सर ही गेहूँ को पिसाने मे।

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हौसलाफजाई जो की थी मनोगुरू की और यह पहचान दिला दी…. शुक्रगुजार है ,

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