“मेरी प्यारी गौरैया” ~~( राघव शंकर )~~

मेरी प्यारी गौरैया!

 

जब मैं भरी दोपहर में स्कूल से लौट कर घर आता,तो बाहर लगे नल को चला कर हाथ पैर धोता और फिर वहीं लगे नींबू के पेड़ के नीचे जो कि ज्यादा फल आने से झुक गया था और एक छतरी के जैसा बन गया था, उसी के नीचे दादा जी के आराम करने के लिए पड़ी खाट पर लेट जाता थोड़ी देर आराम करने के लिए।

पेड़ के नीचे की ठंढक नल के करीब होने से और भी ज्यादा बढ़ जाती थी,और फिर चिड़िया रानी तुम्हारा झुण्ड नींबू के पेड़ पर बैठ कर मेरे सिर के पास जो चौं चौं चौं करता था न,उसे देखकर मुझे अपनी क्लास में मास्टर साहब के न आने पर चिल्लाती, उछलती, कूदती लड़कियो का ख़याल आने लगता और क्लास की लड़कियों का ख्याल आते ही एक वो लड़की ज़हन में आती जो कि रोज मास्टर साहब के क्लास में पहला पाँव रखते ही चिल्लाती “सर जी कल जो सवाल आप करने को दिए थे न ! हम कर लाये हैँ!”
और उसका ख़याल आते ही मैं झुँझला कर उठ पड़ता क्योँकि मैंने मास्टर जी का दिया एक भी सवाल अब तक नहीं दिखाया था,और फिर इसी गुस्से में मैं तुम्हारे झुँड को एक ढेला मार कर उड़ा देता था ।
पर यकीन करो मैं तुमसे नाराज नहीं हुआ था।

जब कभी घर के छत पर गेंहूँ धो कर सुखाया जाता था तो मेरी ड्यूटी लगती थी उसकी देखभाल करने की ।
कि कहीँ तुम और तुम्हारी सहेलियाँ चों चों करते करते पूरा गेंहूँ साफ़ न कर डालेँ !
पर चिड़िया रानी तुम भी बहुत जिद्दी थी,
जिस दिन चावल या गेंहूँ छत पर फैलाया जाता तुम अपनी सहेलियों के साथ पास के “विलयित”(जंगली बबूल) के पेड़ पर जिसका एक हिस्सा मेरे छत की तरफ झुका हुआ था,सुबह से ही चों चों करना शुरू कर देती और जैसे ही मेरी निगाह थोड़ी इधर उधर होती तुम सखियों के साथ बेचारे गेंहूँ के दानो पर अपना धावा बोल देती,और फिर जैसे ही मेरी नजर तुम पर पड़ती फुर्ररर से उड़ कर फिर से उसी पेड़ पर बैठ जाती और फिर से चौं चौं सुरु !
मैं गुस्से में आता और तुम सब उस पेड़ से उड़ा देता ।
थोड़ी देर बाद तुम फिर पहुँच जाती पेड़ पर और मैं फिर उड़ा देता तुमको,तुम्हारी और मेरी यह लड़ाई न जाने कितनी बार होती थी।
और आखिर में गेंहूँ इकट्ठा कर लिया जाता और तुम सब चों चों करना फिर से सुरु कर देती।
यकीन करो मैं तुमसे नाराज नहीं था,मैंने तो सिर्फ खुद को डाँट से बचाने के ड़र से तुमको दाना नहीं चुगने दिया था।
…….
चिड़िया रानी,
तुम्हें याद है जब तुम और तुम्हारी सखियों ने घर के आँगन में लगे नए शीशे में अपना चेहरा देख देख कर उसे टोट मार मार कर चों चों करते हुए शीसे को तोड़ दिया था,और मैंने शीसे को टूटा हुआ देखकर तुम्हें पास में पड़े छड़ी से डरा कर भगा दिया था।
मैं गुस्से में था जरूर उस वक्त लेकिन इतना भी ज्यादा नहीं कि तुम्हें दुबारा आने से मना करूँ।
सच कहूँ तो मैं बतब भी तुमसे नाराज नहीं हुआ था ।

चिड़िया रानी तुम्हारे मम्मी पापा ने जब हमारे घर के दीवाल के बीच की ख़ाली जगह में अपना घर
जबरदस्ती बना लिया था तब भी मैंने कुछ नहीं कहा,
जब तुम्हारे मम्मी पापा ने उस गोल गोल अंडे को अपने घर यानी कि मेरे दीवाल के बीच रखा ,जिसमे की तुम छुपी हुई थी,और जिसको देखकर मुझे ड़र लगता था कि कहीं रोज रोज उस को देखकर मेरे स्कूल के वार्षिक परीक्षा परिणाम में भी अंडे ही न आ जाएँ,
तब भी मैं नाराज नहीं हुआ था।
जब तुम उस अंडे से निकली तो
मेरे खुशी का ठिकाना न रहा।
सुबह स्कूल जाने के टाइम तुम्हारी चौं चौं मुझे इतनी अच्छी लगती कि मेरा स्कूल जाने का मन ही नहीं करता था।

चिड़िया रानी मुझे याद है कि
एक दिन मैंने तुम्हें किसी तरह पकड़ कर रँग दिया था और फिर तुम अपने सहेलियों से अलग दिखने लगी थी।मैं बहुत खुश था कि तुम मेरे रँग में रंगी हुई हो,
लेकिन दूसरे दिन जब मैंने तुम्हे देखा तो तुम फिर से अपने पहले वाले रँग में थी बिलकुल अपनी सखियों के रँग में,मेरा रँग तुम्हारे ऊपर से उतर गया था,
शायद तुमने पड़ोस के गाँव के तालाब में खूब मल मल कर अपने शरीर को धोया था।
चिड़िया रानी मुझे अपना रंग तुम पर से उतर जाने का दुःख हुआ था पर,यकीन करो मैँ तब भी तुमसे नाराज नहीं था।
……
चिड़िया रानी
आज कल न जाने क्यूँ तुम नजर नहीं आती हो,
कभी कभी दिखती भी हो तो अकेले, 
तुम्हारी सखियाँ भी नहीं दिखती तुम्हारे साथ,एक दो सखियो के सिवाय!

नींबू के पेड़ पर पहले जैसी चहचहाहाट भी नहीं सुनाई देती है अब। सच कहूँ तो मुझे तुम्हारी चों-चों बहुत अच्छी लगती थी,
मैं तुमसे कभी नाराज नहीं हुआ।
लेकिन तुम न जाने क्यूँ नाराज हो गयी ?

गौरैया रानी तुम्हारे और तुम्हारे साखियों के लिए अब मैं एक कटोरे में दूध भात भर कर अक्सर छत पर रख देता हूँ।
ताकि तुम लौट आओ,
मेरे छत पर,मेरे आँगन में,
मेरे नींबू के पेड़ पर,
और जी भर के चहचहाओ,
मैं तुमसे नाराज़ नही हूँ।

~ राघव शंकर
(करीब एक साल पहले )

English name: sparrow,
Scientific name: Passeridae.

Pic credit : Google baba

Writer’s Name : Raghav Shankara 

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