ज़िन्दगी

कल एक झलक देखी ज़िन्दगी की ,वो मेरी राहों में गुनगुना रही थी । फिर ढूँढा उसे दर-बदर , वो आँख-मिचौली कर मुस्करा रही थी । एक अरसे बाद आया मुझे करार , वो सहलाकर मुझे सुला रही थी ।हम दोनों क्यूँ है खफा एक दूजे से , मैं उसे और वो मुझे समझा रही थी । मैंने पूछ लिया कि ,”क्यूँ दर्द दिया ज़ालिम तूने “? वो बोली , ” कि मैं ‘ज़िन्दगी’ हूँ…

"ज़िन्दगी"

Manoguru

ये खुमार-ए-इश्क है साहब…! अब शायद ना बीमारी जाएगी, कहते हो…! तो करता हूँ चैन से करार पर वक्त रहते बेकरारी तो जाएगी हूँ जमीं पे, तब तलक शायरबाजी ही भाएगी :- All copyrights are reserved to the respected writer. Using any content without permission is highly prohibited.

"Manoguru"

Monika Singh

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“झुलसती भावना”— मनोगुरु

कलम का उकेरना शुरू कर रहा हूँ रश्मि के घर से ताकि आप भी रूबरू हो सकें उसके परिवार से और उस आँगन से जिसकी रश्मि ही रौनक थी | उस आँगन में रश्मि ने छन .- छन छनकती पायलों को बाँध पहला पग भी रखा था | किसी कोने में भाई-बहिन सहेलियों के साथ घर घर भी खेला तो उसी दहलीज पर बैठकर दादी माँ से बालों की चोटियाँ भी करवाई |छत पर बैठकर…

"“झुलसती भावना”— मनोगुरु"