तुम ही तो प्यार हो – कृष्णकांत वर्मा

हम उनके लौटने की राह रोज देखते रहे , जिंदगी के स्वप्न को यूँ रोज भूलते रहे … भूल वो गए मुझे तो क्या नई ये बात है , हम तो अब भी गीत में उन्हें ही ढालते रहे … आज फिर वो खुश हुए जो हम उन्हें यूँ दिख गए , याद फिर वही किया जहां थे हम अटक गये … वो आज पूछने लगी कि हाल कैसा है मेरा , कि पूछने लगी…

"तुम ही तो प्यार हो – कृष्णकांत वर्मा"

कवि मयंक मिश्रा ” रायबरेली “

जो बीत गया है वो कभी आ नही सकता कोई वक़्त से पहले यहा कुछ पा नही सकता जीवन है एक अनमोल सफर देखकर चलना कुदरत का भजन कर कोई ठुकरा नही सकता कवि मयंक मिश्रा रायबरेली   मेरा दिल तोड़ने वाले तेरा दिल टूट जायेगा। सवेरा है तो मुस्कालो अँधेरा भी तो आयेगा समय अच्छा तो सब संग हैं मगर इतना न इतराओ । बुरा जब वक़्त होगा तो न कोई पास आएगा। कवि…

"कवि मयंक मिश्रा ” रायबरेली “"

“नव्या” – एक खत तुम्हारे नाम end— मनोगुरू

तुम कब अपनी राह पर और मैं अपनी डगर चल दिya पता नहीं चल रहा था या मानो छुपाने की कोशिश कर रहा हूँ । आज मैं अपनी इस बे-जुबान कलम के साथ जो शायद तुमने थमा दी ,उतनी ही मुहब्बत करता हूँ जितना कि तुमसे पर फर्क है काफी कि ये तुम्हारी तरह सवाल जवाब नहीं करती । बस जो मन मैं आता है उसे बयान करती जाती है। खैर वजहें काफी थी तो…

"“नव्या” – एक खत तुम्हारे नाम end— मनोगुरू"

“नव्या”- एक खत तुम्हारे नाम Part 2— मनोगुरू

हाँ… तो बात कहाँ तक पहुँची थी, अरे याद आया । जन्मदिन तुम्हारा हो या फिर मेरा मगर एक दूसरे को सबसे पहले बधाई देने की होड़ सी लगती थी और हर बार शायद तुम ही जीती उस फर्ज को । खैर याद है ना तुम्हें काफी जिद करती थी तुम मुझसे बस एक गाना सुनने को कि-“बस एक बार सुना दो ना” दो आjतक मैंने सुनाया ही नहीं पर अब कभी-कभी जब तन्हाई कचोटती…

"“नव्या”- एक खत तुम्हारे नाम Part 2— मनोगुरू"

“वो बे-गुनाह थी”- मनोगुरू

1.↓ “वो बे-परवाह शख्स” ↓ जूझ बैठा आज मन , बस ख्वाब में उस शख्स से पूछ बैठा आज सुन , शीशे में अपने अश्क से…. बेवक्त ही क्या वक्त माँगा …? सिरफिरे कम्बख्त ने…… वक्त था पर ना दिया, उस दिल-ए-सख्त ने…… वक्त भी बे-वक्त बोला, माँगा ही क्यूँ उस शख्स से…? सख्त था जो ना दिया, उस दिल-ए-कम्बख्त ने…… सूझ बैठा आज क्यूँ , जूझने को अश्क से पूछ बैठा आज क्यूँ ,…

"“वो बे-गुनाह थी”- मनोगुरू"

“तेरा ना होना बेहतर है” – मनोगुरु

वो थी तब खुश था वो थी तब खुश था, जो अब नाखुश है…. .वो थी सब कुछ था, जो अब ना कुछ है…. .‘वो’ और ‘मैं’ तब “हम” थे , जो अब ना हम हैं… .वो थी गम कम थे , जो अब गम नम हैं…. वो साथ थी , तब दम था… जो बात भी , अब कम है.. .बेशक दूरियाँ हैं , औ गम हैं पर आज भी हम , “हम” हैं……

"“तेरा ना होना बेहतर है” – मनोगुरु"