“जल का तांडव”- मनोगुरू

“जल का तांडव” सैलाब के सितम ने देखो , आशियानों को डुबाया है…. जी रहे परिवार कोे संग , जीते जी ही बहाया है….. आपदा का स्वरूप धर यूँ , जल ने तांडव दिखाया है…… अब कष्टरूपी बारिश में देखो, जीवन कैसे नहाया है….. तन,धन,जन,अन्न भी , जल की जलन ने जलाया है…. खुशनुमा था हाल सबका , उनको भूखा रुलाया है …. सैलाब के सितम ने देखो , अरमानों को ढहाया है , बैर…

"“जल का तांडव”- मनोगुरू"

वो आज भी जिंदा हैं…- manoguru

उस गाँव में वो हरे-भरे पेड़ , चहचहाते पक्षी , कोलाहल करती कहीं बच्चों तो कहीं युवाओं की टोलियाँ , वहीं नुक्कड़ पर बुजुर्गों की गपशप वाली चर्चाएँ तो कहीं खेत की ओर जाते किसान… और भी बहुत कुछ मानो संसार का हर द्रश्य एक ही जगह बसता हो । कढी़ मेहनत और उम्मीद का दामन थामे हर परिवार खुशियों से जीवन व्यतीत कर रहा था। क्यूँकि यहाँ ना तो वो शहर वाली पानी की…

"वो आज भी जिंदा हैं…- manoguru"