कवि मयंक मिश्रा ” रायबरेली “

जो बीत गया है वो कभी आ नही सकता कोई वक़्त से पहले यहा कुछ पा नही सकता जीवन है एक अनमोल सफर देखकर चलना कुदरत का भजन कर कोई ठुकरा नही सकता कवि मयंक मिश्रा रायबरेली   मेरा दिल तोड़ने वाले तेरा दिल टूट जायेगा। सवेरा है तो मुस्कालो अँधेरा भी तो आयेगा समय अच्छा तो सब संग हैं मगर इतना न इतराओ । बुरा जब वक़्त होगा तो न कोई पास आएगा। कवि…

"कवि मयंक मिश्रा ” रायबरेली “"

“तुम नहीं समझोगे” – मीरा श्रीवास्तव (गुरू माँ)

—– “तुम नहीं समझोगे” —– महलों में रहने वालों तुम क्या समझोगे जज्बातों को क्या समझोगे रिश्ते नातों को क्या समझोगे दुखियारी के रूनदन को क्या समझोगे अन्तर मन की वेदना को क्या समझोगे गरीब की लाचारी को क्या समझोगे मध्यम श्रेणी की पीड़ा को क्या समझोगे दुनियादारी को, क्या समझोगे ममता के बन्धन को महलों में रहने वाले सोने की चमक से चमक रहे नींव की ईंट की पीड़ा तुम क्यों नहीं समझ रहे…

"“तुम नहीं समझोगे” – मीरा श्रीवास्तव (गुरू माँ)"

“जल का तांडव”- मनोगुरू

“जल का तांडव” सैलाब के सितम ने देखो , आशियानों को डुबाया है…. जी रहे परिवार कोे संग , जीते जी ही बहाया है….. आपदा का स्वरूप धर यूँ , जल ने तांडव दिखाया है…… अब कष्टरूपी बारिश में देखो, जीवन कैसे नहाया है….. तन,धन,जन,अन्न भी , जल की जलन ने जलाया है…. खुशनुमा था हाल सबका , उनको भूखा रुलाया है …. सैलाब के सितम ने देखो , अरमानों को ढहाया है , बैर…

"“जल का तांडव”- मनोगुरू"

“नव्या”- एक खत तुम्हारे नाम (manoguru)

यह खत जो मैं तुम्हारे साथ बीते उन यादगार पलों को दोहराते हुए लिख रहा हूँ , शायद तुम्हारी उन नजरों से ओझल ही रहे जिन्हें देखकर मैं कभी अनकही बातों को बड़ी आसानी से परख लेता था। खैर वो अलग बात है पर तुम्हें याद तो होगा ही कि मुझे तुम्हारे इर्द-गिर्द काफी चक्कर लगाने पड़े थे बस एक ‘हाँ’ सुनने थी ।और काफी कोशिशों के बाद मन मुताबिक जवाब मिला तो वो कहावत…

"“नव्या”- एक खत तुम्हारे नाम (manoguru)"

“वो गरीब की झोपड़ी” – मनोगुरु

शहर के एक कोने में कदमों के पास लेकिन नजरों से कोसों दूर गरीबी की धुंध में दबी सी, शायद तभी दिन हो या रात वहाँ मंजर समान ही रहता है । मगर इंसान की हसरत की तरह उसकी फितरत जो नहीं बदलती है । जहाँ शोरगुल का माहौल होते हुए भी शोर ही गुल था , शायद शोर भी उस दहलीज तक पहुँचते ही दम सा तोड़ देता हो। वहाँ से शहर और वो…

"“वो गरीब की झोपड़ी” – मनोगुरु"