“जल का तांडव”- मनोगुरू

“जल का तांडव” सैलाब के सितम ने देखो , आशियानों को डुबाया है…. जी रहे परिवार कोे संग , जीते जी ही बहाया है….. आपदा का स्वरूप धर यूँ , जल ने तांडव दिखाया है…… अब कष्टरूपी बारिश में देखो, जीवन कैसे नहाया है….. तन,धन,जन,अन्न भी , जल की जलन ने जलाया है…. खुशनुमा था हाल सबका , उनको भूखा रुलाया है …. सैलाब के सितम ने देखो , अरमानों को ढहाया है , बैर…

"“जल का तांडव”- मनोगुरू"

“माँ-बाप हैं , कोई बोझ नहीं” -मनोगुरू

माँ-बाप हैं , कोई बोझ नहीं अरमान देख उनके, सब कुछ लुटा दिया, सम्मान देखा उनका , ये सर ही झुका दिया… देखा जो गिरते उनको , हाथों से उठा दिया कोई कभी माँ-बाप ना उनका, कहकर रुला दिया अब हम उम्र की दहलीज पर, तो ख्यालों से गिरा दिया अभिषेक त्रिपाठी ‘मनोगुरू’ ↑….↓ + kavyana (Anamika) कम्बख्त वक्त का रुख देखो , बिन आस के हम जीते देखो…. हर साँस में बसता “वो” अब…

"“माँ-बाप हैं , कोई बोझ नहीं” -मनोगुरू"

“वो गरीब की झोपड़ी” – मनोगुरु

शहर के एक कोने में कदमों के पास लेकिन नजरों से कोसों दूर गरीबी की धुंध में दबी सी, शायद तभी दिन हो या रात वहाँ मंजर समान ही रहता है । मगर इंसान की हसरत की तरह उसकी फितरत जो नहीं बदलती है । जहाँ शोरगुल का माहौल होते हुए भी शोर ही गुल था , शायद शोर भी उस दहलीज तक पहुँचते ही दम सा तोड़ देता हो। वहाँ से शहर और वो…

"“वो गरीब की झोपड़ी” – मनोगुरु"