गुनहगार हूं मैं (” मीरा श्रीवास्तव “)

प्यार करना गुनाह है तो गुनहगार हूं मैं सबको अपना समझना गुनाह है तो गुनहगार हूं मैं अपनों पर विश्वास करना गुनाह है तो गुनहगार हूं मै अपनो से अपने पन की प्यार मोहब्बत की छोटी छोटी खुशियों की चाहत रखना गुनाह है तो गुनहगार हूं मैं, गुनाहों की सज़ा अपने ही मुझे खूब दे रहे हैं हम जिनसे करते हैं प्यार हमें नज़र अंदाज़ कर रहे हैं, नफ़रत के नश्तर हर पल चुभो रहें…

"गुनहगार हूं मैं (” मीरा श्रीवास्तव “)"

गर तुम पढ़ लेती

बात बेबात ऐसे न सताओ उनको जख्म दो पर ऐसे न भुलाओ उनको ये जो आखों में रखे है मोती थोड़े ये अमानत है ऐसे न लुटाओ उनको बातो बातो मे ऐसे न बहलाओ उनको जरा सी बात है थोड़ा सा मनाओ उनको वो मान जाएगें ऐसी तो कोई बात नही ये तो अपने है ऐसे न रूलाओ उनको – आशुतोष पाण्डेय शब्द सा तुम बनी, अर्थ मै हो गया। आत्मा तुम बनी, देह मै…

"गर तुम पढ़ लेती"

“तुम नहीं समझोगे” – मीरा श्रीवास्तव (गुरू माँ)

—– “तुम नहीं समझोगे” —– महलों में रहने वालों तुम क्या समझोगे जज्बातों को क्या समझोगे रिश्ते नातों को क्या समझोगे दुखियारी के रूनदन को क्या समझोगे अन्तर मन की वेदना को क्या समझोगे गरीब की लाचारी को क्या समझोगे मध्यम श्रेणी की पीड़ा को क्या समझोगे दुनियादारी को, क्या समझोगे ममता के बन्धन को महलों में रहने वाले सोने की चमक से चमक रहे नींव की ईंट की पीड़ा तुम क्यों नहीं समझ रहे…

"“तुम नहीं समझोगे” – मीरा श्रीवास्तव (गुरू माँ)"

“मैं तुम और हम” —कवि अंकित

मैं तुम और हम” मैं डूबा तेरी आँखों में ,आँखों में मेरे पानी है….. कुछ उलझी , कुछ उलझन सुलझी अपनी एक कहानी है…. तेरे होंठों पे नाम जो आया, थोड़ा सा मुस्कराया…. रिश्तों को जरा सँजोए रखो , मौत तो हमको आनी है….. मेरे सपने कुछ हैं टूटे , कुछ तुमसे हैं जुड़े हुए …. जीवन के कुछ पन्ने अब भी हैं, थोड़े से मुड़े हुए…. मैं तुझसे पूरा होता हूँ , तू मुझमें…

"“मैं तुम और हम” —कवि अंकित"