Modernisation

“रोटी” माथे पर, कड़क तडपता सूरज। बदन की करता लाही । सूलगे हुए सपने संग, झूलसाती गर्मी में । हवा के झोके से, मिले हल्का सूकुन । फटा हुवा गमछा , पोछता सारा पसीना । छिटक कर हाथ से, माथे की बूंदे । देखता एक बार, सूरज की ओर । फिर, पेड़ के निचे बैठकर । एक मजदुर, खाता है रोटी, तोड़कर एक एक कौर । प्रदीप सहारे लोधिवली-पनवेल “अाधुनिकता” आधुनिकता के मोह में, एैसे…

"Modernisation"