फिर भी दहेज जरूरी है (शैलेन्द्र वर्मा)

उम्र गुजारी हमने बेटी का दहेज जुटाने में, ये कमर झुकती गई बच्चो को पढ़ाने मे। ……. एक एक दिन गुजरता वेतन के इंतजार मे, चप्पल घिस गयी जी.पी,एफ निकालने मे। ……. सरकारी कर्मचारी सेहरा मक्कारी का सर पे हे…, किसे बताएँ क्या सहा भष्टाचार से दामन बचाने मे ……. आधी पगार तो इ.एम.आई मे चली जाती हे यारो, झुरिया चेहरे पे आई खिचतान के घर चलाने मे…। …….. रोज़ डाँट सुनते बोस कि लेट दफ्तर…

"फिर भी दहेज जरूरी है (शैलेन्द्र वर्मा)"

“जल का तांडव”- मनोगुरू

“जल का तांडव” सैलाब के सितम ने देखो , आशियानों को डुबाया है…. जी रहे परिवार कोे संग , जीते जी ही बहाया है….. आपदा का स्वरूप धर यूँ , जल ने तांडव दिखाया है…… अब कष्टरूपी बारिश में देखो, जीवन कैसे नहाया है….. तन,धन,जन,अन्न भी , जल की जलन ने जलाया है…. खुशनुमा था हाल सबका , उनको भूखा रुलाया है …. सैलाब के सितम ने देखो , अरमानों को ढहाया है , बैर…

"“जल का तांडव”- मनोगुरू"

वो आज भी जिंदा हैं…- manoguru

उस गाँव में वो हरे-भरे पेड़ , चहचहाते पक्षी , कोलाहल करती कहीं बच्चों तो कहीं युवाओं की टोलियाँ , वहीं नुक्कड़ पर बुजुर्गों की गपशप वाली चर्चाएँ तो कहीं खेत की ओर जाते किसान… और भी बहुत कुछ मानो संसार का हर द्रश्य एक ही जगह बसता हो । कढी़ मेहनत और उम्मीद का दामन थामे हर परिवार खुशियों से जीवन व्यतीत कर रहा था। क्यूँकि यहाँ ना तो वो शहर वाली पानी की…

"वो आज भी जिंदा हैं…- manoguru"