सुनो..! माँ ऐसी होती है – रिया स्वर्णकार

सुबह सूरज से पहले उठती है। रात में सबके बाद सोती है। वो माँ ही है यारो, जो खुद की फिक्र छोर हमारे लिए दिन रात मरती है। सुबह क्या बनेगा ये सोचते-सोचते सोती है। सबको सबके वक्त ही पर ही खिलाती है। वो माँ ही है यारो, जो खुद के नास्ते का पहला निवाला दोहपहर में खाने के वक़्त खाती है। हमारी छोटी-छोटी खुशियों पर हमसे भी ज्यादा खुश हो जाती है। पापा की…

"सुनो..! माँ ऐसी होती है – रिया स्वर्णकार"

Riya Swarnkar

लफ़्ज़ों में कुछ कह पाना उस रात में बेहद मुश्किल होगा, जब सदियो से भटकते मुसाफिर के सामने घूंघट में छिपा उसका कारवां होगा। बढ़ती धड़कने और माहौल में सन्नाटों का शोर होगा, जब झुकी हुई नजरों का उठना और क़यामत का गिरना होगा। कपकपाते हाथो से उसकी नरम हथेलियों का यूँ छूना होगा, तब अंदर उमड़ता तूफान और बाहर खामोशियों का नजारा होगा। कंगन, बेंदी,झुकमों का जब उसके बदन को अलविदा कहना होगा, सिरह…

"Riya Swarnkar"